6 टिप्पणियाँ

T-27/16 अदा फ़क़ीरों सी लहजे में शहरयारी रख-बकुल देव

अदा फ़क़ीरों सी लहजे में शहरयारी रख
तमाशबीन बहुत हैं तमाशा जारी रख

हुनर ये हब्स के आलम में काम आएगा
बचा के तेज़ हवाओं में ख़ाकसारी रख

फ़कत सराब ही अहले-नज़र को आएं नज़र
अब इस तरह भी न आंखों को रेगज़ारी रख

उदास उदास ख़जां चाहती है राहे-फ़रार
फ़सीले-दिल में कोई रौज़ने-बहारी रख

ये नातवानी तिरी होने वाली है मक़बूल
कुछ और देर मिरी जान उस्तवारी रख

सफ़र है तन्हा बहुत इश्क़ के पड़ाव के बाद
बचा के अपने लिये यादे-ग़मगुसारी रख

सुख़न पशेमां हैं इस हा-ओ-हू के मेले में
समाअतों को बयां पर ज़रा सा भारी रख

ये नर्म पर्दा अभी दरमियान रहने दे
‘छुपा के यार तबस्सुम में बेक़रारी रख’

‘बकुल’ ज़रूरी है ये मस्लेहत भी बहरे-हयात
बराए नाम सही शग़ले-रोज़गारी रख

बकुल देव 09672992110

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6 comments on “T-27/16 अदा फ़क़ीरों सी लहजे में शहरयारी रख-बकुल देव

  1. क्या कहने बकुल साहिब
    उम्दा ग़ज़ल , मतला भी ख़ूब है
    वाह वाह.

  2. Bakul Sahab, umda gazal! Daad kubool farmayein…

  3. Bakul sahab behtareen ghazal kahi hai aap ne sabhi sher khoob hain waah mubaarakbaad qabool kare’n.
    Shafique Raipuri

  4. बकुल भाई।
    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल।
    दाद दिल से।
    सादर
    नवनीत

  5. फ़कत सराब ही अहले-नज़र को आएं नज़र
    अब इस तरह भी न आंखों को रेगज़ारी रख
    Wahhhhhhh Wahhhhhhh dada
    Bahut pyari gazal
    dili daad qubul kijiye

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