2 टिप्पणियाँ

T-27/12 न अहतमामे-मुसलमां को शाकाहारी रख-असरार उल हक़ ‘असरार’

न अहतमामे-मुसलमां को शाकाहारी रख
हमेशा आगे मिरे क़ोरमा निहारी रख

विदाई कह ले क़सीदा या मर्सिया कह ले
ग़ज़ल-निगार न बन ख़ुद को ब्रह्मचारी रख

तू ऊँच-नीच को नज़दीक हो के जानेगा
कभी गधे को कभी ऊंट को सवारी रख

मुक़ाम लाख हो चुल्लू में डूब मरने का
तू आस-पास भी अपने न शर्मसारी रख

जहाँ से जो भी मिले जिंस एक भाव ख़रीद
कि इम्तियाज़े-बिचारा न कुछ बिचारी रख

तुझे है तीर की तलवार की ज़रूरत क्या
यही बहुत है कि तू जीभ को कटारी रख

यही है बज़्म में छा जाने का हुनर ‘असरार’
कि लहजा नरम तो आवाज़ को करारी रख

असरार उल हक़ ‘असरार’ 09410274896

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2 comments on “T-27/12 न अहतमामे-मुसलमां को शाकाहारी रख-असरार उल हक़ ‘असरार’

  1. असरार साहब वाह क्या खूब अंदाज़ है ग़ज़ल का बहुत बहुत बधाई आपको

  2. Tujhe hai teer ki talwaar ki zaroorat kya
    yahi bahut hai k tu jeebh ko kataari rakh

    Waah Asraar sahab kya kahne khoob tanz hai waah Mubaarakbaad
    shafique raipuri

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