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T-27/8 जमाले-यार से इस तरह साज़गारी रख-मुनव्वर अली ताज

जमाले-यार से इस तरह साज़गारी रख
‘छुपा के यार तबस्सुम में बेक़रारी रख’

सनम के वास्ते इतनी जवाबदारी रख
हरिक सितम के लिए अपनीख़ुशगवारी रख

ख़ुशी के खेत में होते नहीं हैं ग़म पैदा
ग़मों की पौॆध में अश्कों की आबयारी रख

अदब-नवाज़ समाअत का मेज़बां बनकर
ग़ज़ल के चाहने वालों में शबगुज़ारी रख

ग़ज़ल से जो भी कहोगे वो मान जाएगी
वफ़ा की बात सलीक़े से प्यारी प्यारी रख

ग़ज़ल को नूर बनाकर चली गई है जो
उसी बहार की यादों से इश्क़ जारी रख

रिया के राजघराने सेताज’ तौबा कर
दया के टूटते रिश्तों में जांनिसारी रख

मुनव्वर अली ताज 098934 98854

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3 comments on “T-27/8 जमाले-यार से इस तरह साज़गारी रख-मुनव्वर अली ताज

  1. Kamaal kiya hai Taaj saahab aap ne is baar 2-2 ghazal ye bhi ghazal khoob hai. Girah k saath matla bhi khoob hai. Daad haazir hai qabool kare’n.
    Shafique Raipuri

  2. अदब-नवाज़ समाअत का मेज़बां बनकर
    ग़ज़ल के चाहने वालों में शबगुज़ारी रख

    वाह वाह..
    क्या कहने मुनव्वर साहब.

  3. वाह बहुत सुंदर लाजवाब

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