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T-27/1 हंसी-मज़ाक़ भी कर थोड़ी आहो-ज़ारी रख-शमीम अब्बास

हंसी-मज़ाक़ भी कर थोड़ी आहो-ज़ारी रख
बरा-ए-नाम सही कुछ तो वज़्अदारी रख

दिखाई गर्मी, बरस भी पड़ा तो सर्द भी पड़
सभी रुतों को मेरी जान बारी-बारी रख

भला अकेला चना भाड़ फोड़ता है कहीं
तू हमसे थोड़ी बहुत रख प साझेदारी रख

पड़ी किसी को नहीं है तिरी तो ठीक है फिर
तू मस्त अपने में रह ख़ुद को ख़ुद प तारी रख

तो यूं करें कि न आड़े किसी के आये कभी
मैं दुनियादारी रखूं और तू दीनदारी रख

दबी-दबी हो मगर राख में हो चिंगारी
”छुपा के यार तबस्सुम में बेक़रारी रख”

हमें पता है कि है इन तिलों में कितना तेल
तू अपने पास ही सब अपनी जांनिसारी रख

हवस उड़ाए फिरी दर-ब-दर तमाम तुझे
कहा था क़ाबू हो जिस पर वही सवारी रख

शमीम अब्बास 09029492884, 07506213798

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15 comments on “T-27/1 हंसी-मज़ाक़ भी कर थोड़ी आहो-ज़ारी रख-शमीम अब्बास

  1. aik achchhi ghazal se nawaza aapne janab shameem abbas saheb…
    (waquif ansari)

  2. कमाल !
    कमाल !!
    कमाल !!!

  3. हुज़ूर
    बंदगी

    ठहर सा गया हूँ ग़ज़ल पढ़ कर। एक इक लफ्ज़ ऐसे गूंथा है जैसे उनकी आमद इसीलिए हुयी हो । दादा तुफैल जी का आभार कि इस तरही का आगाज़ जनाब शमीम अब्बास जैसे बड़े शायर की ग़ज़ल से किया है। इस बार की तरही की फ़स्ल अनोखी होगी। फिलहाल इस रसीले फल का आनंद ले रहा हूँ।

    हंसी-मज़ाक़ भी कर थोड़ी आहो-ज़ारी रख
    बरा-ए-नाम सही कुछ तो वज़्अदारी रख
    बंदगी बंदगी बंदगी …… !

    दिखाई गर्मी, बरस भी पड़ा तो सर्द भी पड़
    सभी रुतों को मेरी जान बारी-बारी रख
    बारी-बारी रख…… अल्फ़ाज़ को कतार में सजाकर जैसे परेड करा दी हो !

    हमें पता है कि है इन तिलों में कितना तेल/ भला अकेला चना भाड़ फोड़ता है कही ….
    इन मुहावरों के साये में शायरी करना कोई आपसे सीखे !

    दबी-दबी हो मगर राख में हो चिंगारी
    ”छुपा के यार तबस्सुम में बेक़रारी रख”
    हासिल ए ग़ज़ल। … गिरह का अंदाज़ जानलेवा है।

    सजदा करने को जी चाह रहा है।

  4. Janab Shamim Saheb,
    Umda aur murassa ghazal ke liye dad ke phool qubool kijiye. Abhey

  5. वाह, बहोत ख़ूब, कमाल निबाहा है रदीफ़ को

  6. शमीम अब्बास साहब
    बहुत ही खूबसूरत और भरपूर ग़ज़ल हुई है। दिली दाद क़ुबूल फरमायें।
    सादर
    पूजा

  7. kya kahne dadda kya hi achchhi ghazal hui..bilkul aapke rang ki..
    daad qubool keejiye

  8. दबी-दबी हो मगर राख में हो चिंगारी
    ”छुपा के यार तबस्सुम में बेक़रारी रख”
    Kya khoob girah lagi hai…..harek sher kamyaab….muhaavron ka jaandaar istemaal…dili daad kubool karen….
    Saadar
    Bimalendu

  9. Abbas sahab umda kalam …dili daad kubul farmaye ..
    .तो यूं करें कि न आड़े किसी के आये कभी
    मैं दुनियादारी रखूं और तू दीनदारी रख….iss sher pe khas daad …
    Fazle Abbas Saify

  10. जनाब शमीम साहब आदाब ,उम्दा ग़ज़ल हुई है, शैर दर शैर दाद के साथ मुबारक़बाद कुबूल फरमायें ।

  11. दिखाई गर्मी, बरस भी पड़ा तो सर्द भी पड़
    सभी रुतों को मेरी जान बारी-बारी रख

    भला अकेला चना भाड़ फोड़ता है कहीं
    तू हमसे थोड़ी बहुत रख प साझेदारी रख

    पड़ी किसी को नहीं है तिरी तो ठीक है फिर
    तू मस्त अपने में रह ख़ुद को ख़ुद प तारी रख

    तो यूं करें कि न आड़े किसी के आये कभी
    मैं दुनियादारी रखूं और तू दीनदारी रख

    दबी-दबी हो मगर राख में हो चिंगारी
    ”छुपा के यार तबस्सुम में बेक़रारी रख
    ”वाह
    वाआह वाह कमाल अब्बास सर लाज़वाब अशआर

  12. हवस उड़ाए फिरी दर-ब-दर तमाम तुझे
    कहा था क़ाबू हो जिस पर वही सवारी रख
    Wahhhhhhh kya gazal hai
    dili daad qubul kijiye
    Sadar
    Imran

  13. जनाब शमीम साहब उम्दा ग़ज़ल हुई है, गिरह भी खूब लगी है, दाद ओ मुबारक़बाद कुबूल फरमायें

  14. उस्ताद जी ने बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही – ये शे’र बहुत कमाल का हुआ

    हवस उड़ाए फिरी दर-ब-दर तमाम तुझे
    कहा था क़ाबू हो जिस पर वही सवारी रख

  15. लफ्ज़ की सत्ताईसवीं तरही महफ़िल शुरू हुई और उस्ताद शायर शमीम अब्बास साहब ने पहला फल गिराया। बेहद मीठा, रसीला और ख़ुशबूदार। आपकी आमद इस बार की तरही महफ़िल को मुबारक बनाएगी। बंदगी हज़रत, सैकड़ों दाद क़ुबूल फ़रमाइये

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