10 टिप्पणियाँ

T-26/61 क्‍या जरूरी है वफ़ा कीजिए बस-नवनीत शर्मा

हज़रत ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी साहब की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया

मुझसे इक बात किया कीजिए बस
इस कदर मेहरो-वफ़ा कीजिए बस

आफ़रीं सामने आंखें के मिरी
यूं ही तादेर रहा कीजिए बस

दिले-बीमार हुआ अब चंगा
दोस्‍तो तर्के-दवा कीजिए बस

ख़ूने-आशिक़ से ये परहेज़ उसे
आशना-ए-कफ़े-पा कीजिए बस

शर्म ता चंद हया भी कब तक
मुंह से बुर्क़े को जुदा कीजिए बस

गर जु़बां अपनी हो गोया मुदाम
तालेओं का ही गिला कीजिए बस

तुम मियां ‘मुसहफ़ी’ रुख़सत तो हुए
अब खड़े क्‍यूं हो दुआ कीजिए बस

———————————————

नवनीत शर्मा साहब की तरही ग़ज़ल

क्‍या जरूरी है वफ़ा कीजिए बस
मेरे मरने की दुआ कीजिए बस

मुझमें इक दिल भी हुआ करता था
जाइए उसका पता कीजिए बस

तेज़ आरी है ये तन्‍हाई भी
आप हमसे न कटा कीजिए बस

रोशनी जिसकी पड़ी है पीली
उस उजाले की शिफ़ा कीजिए बस

आपने ठीक सुना ज़िंदा हूं
पूछते मुझको रहा कीजिए बस

कोसना ख़ुद को नहीं है अच्‍छा
इससे तो चुप ही रहा कीजिए बस

आप ये हैं तो हैं वो भी सो भी
हमको आप एक लगा कीजिए बस

आप में मुझको न ढूंढे दुनिया
मुझमें इतना न ढला कीजिए बस

अब भी मलबे में है चिंगारी सी
हमपे थोड़ी सी हवा कीजिए बस

हर घुटन जान की दुश्‍मन ठहरी
हमपे भी थोड़ा खुला कीजिए बस

बाहर आने में है तकलीफ़ तो फिर
अपने अंदर ही घुटा कीजिये बस

कोई दुश्मन भी तो हो टक्कर का
जंग ख़ुद से ही लड़ा कीजिये बस

ठीक बस आप हैं तो फिर क्‍या है
ख़ुद को ख़ुद पे ही फ़िदा कीजिये बस

दिल पे छा जाएं अगर बादल भी
धूप चेहरे पे रखा कीजिए बस

हां अगर इश्‍क़ हुआ है तो फिर
ग़म के क़स्‍बे में बसा कीजिए बस

शोर ख़ामोशी का जब बढ़ जाए
अपनी आवाज़ सुना कीजिए बस

जो सियासत है वो ये कहती है
ख़ास मौक़ों पे टला कीजिये बस

ख़ाब तो ख़ाब हैं इन ख़ाबों का क्‍या
इनको दिल पे न लिया कीजिये बस

आपको क़द्र कहां इंसां की
आप तो ख़ुदको ख़ुदा कीजिए बस

दिल की अर्ज़ी है जहां कोई न हो
उस जज़ीरे में रहा कीजिए बस

हम सियासत के नहीं शायर हैं
आप हमसे न डरा कीजिए बस

शाम सूरज को भी रोका था मगर
‘आप तादेर रहा कीजिए बस’

नवनीत शर्मा 09418040160

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10 comments on “T-26/61 क्‍या जरूरी है वफ़ा कीजिए बस-नवनीत शर्मा

  1. जनाब नवनीत साहब क्या खूब ग़ज़ल कही है आपने वाह हर शे’र कमाल है दाद ओ मुबारक़बाद क़ुबूल फ़रमायें

  2. बेहतरीन ग़ज़ल के लिए ढेरों मुबारकबाद और दाद

  3. जनाब नवनीत साहब लाजवाब इस पुरअसर ग़ज़ल के लिये बधाई

  4. वाह सर जी वाह बहुत खूब ग़ज़ल कही है वाह बधाई

  5. ख़ाब तो ख़ाब हैं इन ख़ाबों का क्‍या
    इनको दिल पे न लिया कीजिये बस

    नवनीत जी बेहतरीन ग़ज़ल हुई है |
    दाद हाज़िर है |

  6. Bahut khoob navneet ji.daad qubul karen.

  7. बेहतरीन ग़ज़ल के लिए ढेरों मुबारकबाद और दाद

  8. Dada kaleja pighal.gaya bas….itna hi kahunga. …bahut hu umda gazal hui hai….
    Regds
    Bimalendu

  9. नवनीत साहब मुबारकबाद, आपकी ग़ज़ल आज उस मक़ाम पर खड़ी है जहाँ ख़याल अपने हिसाब से ख़ुद को ढालने के लिये ज़िद करता है। हर शेर कुछ नई सम्त खोलने की कोशिश कर रहा है। ये मंज़िल पुख़्तगी आने से ठीक पहले की मंज़िल है। वाह-वाह, दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  10. मुझमें इक दिल भी हुआ करता था
    जाइए उसका पता कीजिए बस
    तेज़ आरी है ये तन्हाई भी
    आप हमसे न कटा कीजिए बस
    रोशनी जिसकी पड़ी है पीली
    उस उजाले की शिफ़ा कीजिए बस
    आपने ठीक सुना ज़िंदा हूं
    पूछते मुझको रहा कीजिए बस
    कोसना ख़ुद को नहीं है अच्छा
    इससे तो चुप ही रहा कीजिए बस
    क्या बात है नवनीत साहेब वाह

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