10 टिप्पणियाँ

T-26/59 चलता ही नहीं प्यार का अफ़्सूं मिरे आगे-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस की ज़मीन को तरह किया गया

ख़ामुश हैं अरसतूं-ओ-फ़लातूं मिरे आगे
दावा नहीं करता कोई मज़्मूं मिरे आगे

लाता नहीं ख़ातिर में सुख़न बेहुदागो का
एजाज़े-मसीहा भी है अफ़्सूं मिरे आगे

बांधे हुए हाथों को बउम्मीदे-इजाबत
रहते हैं खड़े सैकड़ों मज़्मूं मिरे आगे

समझूँ हूँ उसे मुहरा-ए-बाज़ीचा-ए-तिफ़लां
किस काम का है गुंबदे-गर्दूं मिरे आगे

क़ुदरत है ख़ुदा की कि हुए आज वो शायर
तिफ़ली में जो कल करते थे गां-गूँ मिरे आगे

सब ख़ोशा-रुबा हैं मिरे ख़िरमन के जहाँ में
क्या शेर पढ़ेगा कोई मौज़ूं मिरे आगे

मूसा का असा ‘मुसहफ़ी’ है ख़ामा मिरा भी
गो ख़स्म बने अस्वदो-अफ़यूं मिरे आगे

——————————————–

शफ़ीक़ रायपुरी साहब की तरही ग़ज़ल

चलता ही नहीं प्यार का अफ़्सूं मिरे आगे
लैला मिरे पीछे है तो मजनूं मिरे आगे

बंदिश की तमन्ना लिये मौज़ूं मिरे आगे
‘रहते हैं खड़े सैकड़ों मज़्मूं मिरे आगे

हर दिन नई रहती है मुसीबत मिरे पीछे
हर रोज़ हुआ करता है शबख़ूं मिरे आगे

रहते हैं ख़ज़ाना लिये हिकमत का हमेशा
सुक़रात मिरे पीछे फ़लातूं मिरे आगे

सच पूछो तो मुझको भी कुछ अच्छा नहीं लगता
जब होता है हाल उसका दिगरगूं मिरे आगे

सुनता भी है कि सुनता नहीं हाल वो मेरा
चलता तो है करता हुआ हां-हूं मिरे आगे

हर सम्त बहारें ही बहारें नज़र आतीं
ऐ काश वो करता गुले-गुलगूं मिरे आगे

फिर आज तमन्नाओं को दफ़नाने चला हूँ
फिर आज ये करने लगीं चां-चूं मिरे आगे

मेराज मिरी अर्ज़े-मदीना में खड़ा हूँ
वक़अत नहीं तेरी अभी गर्दूं मिरे आगे

बंदिश में ‘शफ़ीक़’ आज पिला देते हैं पानी
अशआर कभी रहते थे मौज़ूं मिरे आगे

‘शफ़ीक़’ रायपुरी 09406078694

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10 comments on “T-26/59 चलता ही नहीं प्यार का अफ़्सूं मिरे आगे-‘शफ़ीक़’ रायपुरी

  1. जनाब शफ़ीक़ साहब मुश्किल ज़मीन पर बेह्तरीन ग़ज़ल हुई है आपको तहेदिल से मुबारक़बाद

  2. Shafiq Sahab, der aayad durust aayad!
    Aap ki gazal ekdum tarahi ke ithtetaam par aayi hai; magar khoob aayi hai. Mushkil zameen pe behtareen gazal. Dili mubarakbaad aur dhero daad kubool farmayein.

  3. बहुत खूब ग़ज़ल कही है बधाई

  4. Waah shafique bhai bahut behtreen ghazal kahi hai. Daad qubul karen.
    phir aaj tamanna…..
    aur
    Meraj abhi….
    in ashaar ka jawab nahi. Waah.

  5. Shafique saheb, Mushkil zameen men behtreen ghazal ke liye mubarakbaad qubool farmayen.

  6. शफ़ीक़ साहब आपने जिस ज़मीन का इन्तख़ाब किया वो वाक़ई अनूठी और ख़ासी कठिन है मगर आपने कमाल की ग़ज़ल कही है। ववाह वाह दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  7. रहते हैं ख़ज़ाना लिये हिकमत का हमेशा
    सुक़रात मिरे पीछे फ़लातूं मिरे आगे
    सच पूछो तो मुझको भी कुछ अच्छा नहीं लगता
    जब होता है हाल उसका दिगरगूं मिरे आगे
    सुनता भी है कि सुनता नहीं हाल वो मेरा
    चलता तो है करता हुआ हां-हूं मिरे आगे
    हर सम्त बहारें ही बहारें नज़र आतीं
    ऐ काश वो करता गुले-गुलगूं मिरे आगे
    फिर आज तमन्नाओं को दफ़नाने चला हूँ
    फिर आज ये करने लगीं चां-चूं मिरे आग
    वाह शफीक साहेब खूब ग़ज़ल हुई

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