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T-26/58 तूने ही दिल हलाक किया मैंने क्या किया -‘अयाज़’ संबलपुरी

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस की ज़मीन को तरह किया गया

जीते ही जी को ख़ाक किया मैंने क्या किया
अपने तईं हलाक किया मैंने क्या किया

हैराँ हूँ मैं कि क्या ये मिरे जी में आ गया
क्यों ख़त को लिख के चाक किया मैंने क्या किया

ख़ंजर पे उसके रात गला जा के रख दिया
क़िस्सा ही अपना पाक किया मैंने क्या किया

परवाना जल बुझा प न ये शम्म ने कहा
उसको जला के ख़ाक किया मैंने क्या किया

ख़ूशों पे मध के आते ही गुलशन में ‘मुसहफ़ी’
ख़ूँ अपना ज़ेरे-ख़ाक किया मैंने क्या किया

——————————————

‘अयाज़’ संबलपुरी साहब की तरही ग़ज़ल

तूने ही दिल हलाक किया मैंने क्या किया
ख़ुद को जला के ख़ाक किया मैंने क्या किया

दम ख़ुश्क हो गया है सितमगर को देख कर
चेहरे को ख़ौफ़नाक किया मैंने क्या किया

ख़ंजर चला के शोख़ निगाहों का आपने
आशिक़ का सीना चाक किया मैंने क्या किया

उसका ख़याल आते ही ऐसा हुआ ‘अयाज़’
‘क़िस्सा ही अपना पाक किया मैंने क्या किया’

अयाज़ संबलपुरी 08305893443

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2 comments on “T-26/58 तूने ही दिल हलाक किया मैंने क्या किया -‘अयाज़’ संबलपुरी

  1. Waah waah bahut khoob.ayaz sahab.

  2. तूने ही दिल हलाक किया मैंने क्या किया
    ख़ुद को जला के ख़ाक किया मैंने क्या किया
    दम ख़ुश्क हो गया है सितमगर को देख कर
    चेहरे को ख़ौफ़नाक किया मैंने क्या किया
    ख़ंजर चला के शोख़ निगाहों का आपने
    आशिक़ का सीना चाक किया मैंने क्या
    किया
    उसका ख़याल आते ही ऐसा हुआ ‘अयाज़’
    ‘क़िस्सा ही अपना पाक किया मैंने क्या
    किया’
    वाआह वाह बहुत खूब अयाज़ साहेब खूब मुबारक हो

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