6 Comments

T-26/48 कौन से दौर में कब ताजवरी निकले है-अब्दुस्सलाम ‘कौसर’

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस ज़मीन को तरह किया गया

तेरी रफ़्तार से इक बेख़बरी निकले है
मस्तो-मदहोश कोई जैसे परी निकले है

खोल देता है चमन में जो तू जा कर ज़ुल्फ़ें
पा-ब-ज़ंजीर नसीमे-सहरी निकले है

अपने रोने की कोई समझे तो आईना मिसाल
दीदा-ए-ख़ुश्क से आँखों की तरी निकले है

गुल को निस्बत है इसी वास्ते बा अहले-जुनूँ
वज़अ में उसकी जो इक जामादरी निकले है

‘मुसहफ़ी’ किसके खुले बाल तू देख आया है
कि तिरी वज़अ से शोरीदासरी निकले है

————————————————-

अब्दुस्सलाम कौसर साहब की तरही ग़ज़ल

कौन से दौर में कब ताजवरी निकले है
क़ैस क़िस्मत में तिरी दर-ब-दरी निकले है

ये तो क़ुदरत की कोई कारीगरी है वरना
ख़ुश्क पौधे से कहीं शाख़ हरी निकले है

नाज़िशे-हुस्न ग़ज़ब है कि महब्बत के लिये
सात पर्दों से ज़ुलेख़ा सी परी निकले है

मुज़्तरिब कर गयी शायद उन्हें बिस्मिल की तड़प
उनकी आँखों से जो अश्कों की तरी निकले है

मेरे हालात की सब उनको ख़बर है लेकिन
उनके बरताव से तो बेख़बरी निकले है

वस्ल की सुबह वो कमरे से निकलना उनका
‘मस्तो-मदहोश कोई जैसे परी निकले है’

कहकशां झूम उठे चाँदनी देखे तो खिले
शब की वो मांग जो तारों से भरी निकले है

साफ़गोई मिरी फ़ितरत है कि होठों से मिरे
जब भी निकले है कोई बात खरी निकले है

जाने किस-किस को नवाज़ा है महब्बत ने मगर
मेरी क़िस्मत में ही दरयूज़ागरी निकले है

रहगुज़र ये है महब्बत की संभलना ‘कौसर’
ये डगर वो है जो काँटों से भरी निकले है

अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ 09300212960

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

6 comments on “T-26/48 कौन से दौर में कब ताजवरी निकले है-अब्दुस्सलाम ‘कौसर’

  1. कौन से दौर में कब ताजवरी निकले है
    क़ैस क़िस्मत में तिरी दर-ब-दरी निकले है
    क़ैस की ताजवरी सिर्फ शाइरी के दीवानो ने की है वगर्ना –रहगुज़र के नाम पर दश्तो सहरा- इस्तकबाल के नाम पर पत्थर और – अहसास के नाम पर रूह के ज़ख़्म के सिवा उसकी किस्मत में और कुछ नहीं था – गो कि किसी महमिल नशीं को गुमान करने की ज़रूरत नहीं कि ये उसके कारन क़ैस ने किया – ग़ुबारे क़ैस खुद उठता है खुद बर्बाद होता है ……
    ये तो क़ुदरत की कोई कारीगरी है वरना
    ख़ुश्क पौधे से कहीं शाख़ हरी निकले है
    मोज़िज़ा है बेशक और कुद्रत के लिये मुनासिब और जाइज़ भी है – सिक्के का दूसरा पहलू भी है – भरी बरसात में शादाब बेलें सूख जाती हैं
    हरे पेडों के गिरने का कोई मौसम नहीं होता –बशीर बद्र
    नाज़िशे-हुस्न ग़ज़ब है कि महब्बत के लिये
    सात पर्दों से ज़ुलेख़ा सी परी निकले है
    मैं समझता हूँ कि यूसुफ जुलेखा की कहानी भी पढने वाले को मालूम होनी चाहिये वर्ना इस शेर का पूरा आनन्द उसे नही आयेगा !!!
    मुज़्तरिब कर गयी शायद उन्हें बिस्मिल की तड़प
    उनकी आँखों से जो अश्कों की तरी निकले है
    देखिये इस शेर की तश्रीह में मैं आपका ही शेर ले रहा हूँ – ये कुदरत की कोई कारीगरी है वर्ना // खुश्क पौधे से कहीं शाख़ हरी निकले है !!!!!!
    मेरे हालात की सब उनको ख़बर है लेकिन
    उनके बरताव से तो बेख़बरी निकले है
    कोई बात नहीं बर्ताब –मज्लिसी है ये ज़रूरी नहीं कि उनका तर्ज़ुमा भी यही हो –
    बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब
    कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है –गालिब
    वस्ल की सुबह वो कमरे से निकलना उनका
    ‘मस्तो-मदहोश कोई जैसे परी निकले है’
    बहुत खूब जनाब बहुत खूब क्या गिरह लगाई है !!!! मदहोश करने वाला शेर कहा है !!! बकौल फिराक़
    फर्शे मयखाना पे जलते चले जाते हैं चराग़
    दीदनी है तिरी आहिस्ता रवी
    साफ़गोई मिरी फ़ितरत है कि होठों से मिरे
    जब भी निकले है कोई बात खरी निकले है
    बिल्कुल साहब बिल्कुल!! मैं भी ऐसा ही हूँ –
    मैं कडवा सच ज़ियादा बोलता हूँ
    तुम्हारा ज़यका अपनी जगह है –मयंक
    जाने किस-किस को नवाज़ा है महब्बत ने मगर
    मेरी क़िस्मत में ही दरयूज़ागरी निकले है
    वगर्ना हम आप शहरे – अदब में –चमन ए शाइरी मे – दरख्ते सुखन पर शाखे –लफ्ज़ पर थोडी बैठे होते !!
    यकीनन अहसास मे कही कुछ कम है और वो मुहब्बत का सिला ही है !!!
    रहगुज़र ये है महब्बत की संभलना ‘कौसर’
    ये डगर वो है जो काँटों से भरी निकले है
    तस्लीम !!!
    अब्दुस्सलाम ‘कौसर’ साहब !!! –बहुत बहुत खूब शेर कहे हैं आपने !!! मुबारकबाद कुबूल कीजिये –मयंक

  2. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई

  3. Kausar bhai sher khoob hai. Mubarakbad.

  4. बहुत उम्दा शे’र हुए हैं। मुबारकबाद व दाद।

  5. Kausar saheb, aap ne kamaal ke ash’aar nikale hain. Waqai fan isi ko kahte hain. mubarakbad

  6. Kousar sahab mushkil zameen ka intikhaab aur itne achchhe ash’aar waah waah “Daad-o-tahseen” bahut bahut MUBAARAK BAAD. .Ek lambe waqfe k baad Lafzgroup men aap ki haaziri huyi hai. ” M O S T W E L C O M E “

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: