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T-26/44 क्यों चैन-सुकूं अपना, बर्बाद करूँ रोऊं-डॉ मुहम्मद आज़म

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस की ज़मीन को तरह किया गया

आता है यही जी में फ़रियाद करूँ रोऊँ
रोने से ही टुक अपना, दिल शाद करूँ रोऊँ

किस वास्ते बैठा है चुप इतना तू ऐ हमदम
क्या मैं ही कोई नौहा बुनियाद करूँ रोऊँ

यूँ दिल में गुज़रता है जा कर किसी सहरा में
ख़ातिर को टुक इक ग़म से आज़ाद करूँ रोऊँ

इस वास्ते फ़ुर्क़त में जीता मुझे रक्खा है
यानी मैं तिरी सूरत जब याद करूँ रोऊँ

ऐ ‘मुसहफ़ी’ आता है ये दिल में कि अब मैं भी
रोने में तुझे अपना उस्ताद करूँ रोऊँ

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डॉ मुहम्मद आज़म की तरही ग़ज़ल

क्यों चैन-सुकूं अपना, बर्बाद करूँ रोऊं
किस किस को बताओ मैं, अब याद करूँ रोऊं

आहों में कराहों में, लज़्ज़त सी मिली जब से
ग़म एक नया ख़ुद ही, ईजाद करूँ रोऊँ

फ़ुर्सत है कहाँ किस को, पोछे जो मिरे आंसू
याराने-तरब को मैं, जब याद करूँ रोऊँ

अल्ताफ़ो-करम तेरे, हासिल हों मुझे कैसे
क्या दर पे तिरे आकर, फ़रयाद करूँ रोऊँ?

हालात जो दिल के हैं, आफ़ात जो दिल पर हैं
उनका ही मैं अश्कों से, अनुवाद करूँ रोऊँ

मैं हिज्र की रातों में, इस दिल के खंडर में इक
दुनिया ग़मे-उल्फत की, आबाद करूँ रोऊँ

बेकस की यतीमों की, मुफ़लिस की ग़रीबों की
ये सोच के मैं कैसे, इमदाद करूँ रोऊँ

अहबाब ही जब मुझ को, करते नहीं याद ‘आज़म’
दिल उन के लिए फिर क्यों, नाशाद करूँ रोऊँ

डॉ मुहम्मद आज़म 09827531331

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2 comments on “T-26/44 क्यों चैन-सुकूं अपना, बर्बाद करूँ रोऊं-डॉ मुहम्मद आज़म

  1. Dr. AAZAM sahab , Is zameen me’n Radeef nibaahna Mushkil kaam tha magar aap ne bahut hi aasaani se ye kaam kar liya aur umda sher nikaale.,
    Daad-o-tahseen

  2. Bahut bahut khubsurat gazal hui sir
    dili daad qubul kijiye

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