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T-26/41 बेकराँ बेकराँ से उठता है-नवीन सी चतुर्वेदी

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिसको तरह किया गया

अह्ले-दिल गर जहाँ से उठता है
इक जहाँ जिस्मो-जाँ से उठता है

चलो ऐ हमरहो ग़नीमत है
जो क़दम इस जहाँ से उठता है

जम्अ रखते नहीं, नहीं मालूम
ख़र्च अपना कहाँ से उठता है

गर नक़ाब उस के मुँह से उठ्ठी नईं
शोर क्यों कारवाँ से उठता है

वाए बे-ताक़ती ओ बेसब्री
पर्दा जब दरमियाँ से उठता है

फिर वही गिर पड़े है परवाना
गर टुक इक शम्अ-दाँ से उठता है

क़िस्सा-ए-‘मुसहफ़ी’ सुना कर यार
इश्क़ इस दासताँ से उठता है

—————————————-

नवीन सी चतुर्वेदी साहब की ग़ज़ल

बेकराँ बेकराँ से उठता है
आदमी आसमाँ से उठता है

ना-तवाँ, नीम-जाँ से उठता है
बारे-ग़म बेज़ुबाँ से उठता है॥

तन पै आहो-फ़ुगाँ मला कीजे
इश्क़ आहो-फ़ुगाँ से उठता है

क़ामयाबों से कब उठा है इश्क़।
ये तो नाकामराँ से उठता है

देख अब जा रहा हूँ तुझ से दूर
आशियाँ आसताँ से उठता है

दिल धधकता है वस्ल की लौ में
और धुआँ जिस्मो-जाँ से उठता है

बेदमे-ग़म में अब कहाँ वो दम
शोर ही कारवाँ से उठता है

अपने घर में ही रहता है इनसान
पर पराये मकाँ से उठता है

काश हम उस बटन पे आ पाएँ
गीत का सुर जहाँ से उठता है

सच को सच मानते नहीं हम-लोग
कब यक़ीं जिस्मो-जाँ से उठता है

जिसने आलम को कर दिया अन्धा
वो धुआँ ख़ुद जहाँ से उठता है

कोई बतलाए इन हवाओं को
हर बगूला कहाँ से उठता है

जिस को दुनिया समझती है तूफ़ाँ
वो किसी बादबाँ से उठता है

ख़ुश्बुओं को बिखेरने का ख़र्च
तो, किसी बागवाँ से उठता है

कैसे उठते हैं जानता है वह
वाँ फिसल कर वहाँ से उठता है

जो कि पसरी है हर्फ़-हर्फ़ ‘नवीन’
“इश्क़ उस दासताँ से उठता है”

क़त्अ:-

हो मुहब्बत का कोई भी परबत
बेबस और बेज़ुबाँ से उठता है
ज़ुल्म, ज़ुल्मत, ज़ियादती का बोझ
हाँ! हमीं नातवाँ से उठता है

नवीन सी चतुर्वेदी 09967024593

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7 comments on “T-26/41 बेकराँ बेकराँ से उठता है-नवीन सी चतुर्वेदी

  1. Shafiq bhai, Seema ji, Dwij bhai, Shahid bhai, Saifi bhai – sap sabhi ka bahut bahut shukriya

  2. Gazal bhi bohot khoob hai, aur kataa’ bhi khoob hai!
    Dili daad kubool farmayein….

  3. नवीन भाई
    ग़ज़ल तो ख़ूबसूरत है ही
    क़त्अ: और भी ख़ूबसूरत लगा।
    बधाई।

    हो मुहब्बत का कोई भी परबत
    बेबस और बेज़ुबाँ से उठता है
    ज़ुल्म, ज़ुल्मत, ज़ियादती का बोझ
    हाँ! हमीं नातवाँ से उठता है

  4. दिल धधकता है वस्ल की लौ में
    और धुआँ जिस्मो-जाँ से उठता है
    बेदमे-ग़म में अब कहाँ वो दम
    शोर ही कारवाँ से उठता है
    अपने घर में ही रहता है इनसान
    पर पराये मकाँ से उठता है
    काश हम उस बटन पे आ पाएँ
    गीत का सुर जहाँ से उठता है
    सच को सच मानते नहीं हम-लोग
    कब यक़ीं जिस्मो-जाँ से उठता हwaaah waah bhut bhut khoob ghazal hui h naveen saaheb

  5. Naveen sahab 16 ash’aar par mushtamal taveel ghazal k liye daad haazir hai qabool kare’n

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