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T-26/39 अबके सवाले-वस्ल का बन कर जवाब आ-बकुल देव

हज़रत ग़ुलाम हम्दानी मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिसको तरह किया गया

आना है यूं मुहाल तो इक शब न ख़्वाब आ.
मुझ तक ख़ुदा के वास्ते ज़ालिम शिताब आ.

देता हूं नामा मैं तुझे इस शर्त पर अभी,
क़ासिद तू उस के पास से ले कर जवाब आ.

ऐसा ही अज़्म है तुझे गर कू ए यार का
चलता हूं मैं भी ऐ दिले पुर इज़्तिराब आ

ये ख़स्ता चश्म वा है तिरे इंतज़ार में
ऐ सुब्ह मुंह दिखा कहीं ऐ आफ़ताब आ

रोयें गले से लग के बहम ख़्वाब कोई दम
क्या देखता है ऐ दिले बे सब्रो ताब आ

क़ुर्बानी आज दर प तिरे करनी है मुझे
ले कर के तेग तू भी बराए सवाब आ

शायद वो तुझ को देख के ग़म खाए ‘मुसहफ़ी’
तू उस के सामने तो न चश्मे पुर आब आ

———————————————-

बकुल देव साहब की तरही ग़ज़ल

अबके सवाले-वस्ल का बन कर जवाब आ
मैं हूं ख़ज़ां-नसीब ओ मेरे गुलाब आ

फ़न्ने-शनावरी को कनारों से क्या ग़रज़ ?
ये सिन्फ़ सीखने के लिये ज़ेरे-आब आ

दिल के खंडर को देख फिर ऐ ग़म ठिकाना ढूंढ
कहते न थे तुझे कि यहां ह़स्बे-ताब आ

ले दे के मेरे पास बची है जो कुछ रक़म
उस नक़्दे-होश को भी भुना लूं..शराब आ

बांधे हैं जिस्मो-जां को तनाबें उमीद की
ये ख़ेमा गिर न जाय मिरी जां शिताब आ

जी को सुक़ून आए किसी तौर कुछ तो हो
इस बेकली के सहरा में मिस्ले-सराब आ

मेरे सिवा किसी को न उसने दिया ये प्यार
देखा मुझे तो बोल उठा ख़ानाख़राब आ

इम्कां ‘बकुल’ रहे न वहां लौटने का फिर
यूं कर कि उस निगाह में हो कर ख़राब आ

बकुल देव 09672992110

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7 comments on “T-26/39 अबके सवाले-वस्ल का बन कर जवाब आ-बकुल देव

  1. ले दे के मेरे पास बची है जो कुछ रक़म
    उस नक़्दे-होश को भी भुना लूं..शराब आ

    फ़न्ने-शनावरी को कनारों से क्या ग़रज़ ?
    ये सिन्फ़ सीखने के लिये ज़ेरे-आब आ

    बकुल भाई पूरी ग़ज़ल ही शानदार है लेकिन ये दो शेर मुझे बहुत पसंद आये, कमाल के शेर हुए हैं |
    बहुत बहुत मुबारक हो आपको ….

  2. Bohot khoob gazal hai bakul sahab, daad kubool farmayein!

  3. बकुल साहब
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए
    तहे दिल से दाद क़ुबूल फरमाइए

  4. behtareen ghazal hui bakul bhai kya kahne …tarahi ka bharpoor lutf utha rahe hain aap….aur hamen bhi lutfandoz kar rahe hain…mubarakbaad

  5. Waah. Waah.bahut khoob.

  6. इम्कां ‘बकुल’ रहे न वहां लौटने का फिर
    यूं कर कि उस निगाह में हो कर ख़राब आ

    Waah kya kahne…khoob gazal hui hae Bakul ji
    Dheron daad
    Sadar
    Pooja

  7. Bakul sahab Ghaliban Tarah par aap ki ye paanchvi ghazal hai zoodgoyi mubarak ho.
    FANN-E-SHANAWARI KO KINAARO’N SE KYA GHARAZ
    YE SINF SEEKHNE KE LIYE ZER-E-AAB AA…
    WAAH WAAH BAHUT KHOOB DAAD HAAZIR HAI JANAAB

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