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T-26/34 रँग चलते हों जैसे बांकी चाल-तुफ़ैल चतुर्वेदी

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिसकी ज़मीन को तरह किया गया

ओ मियां बांके है कहाँ की चाल
तुम जो चलते हो नित ये बांकी चाल

नाज़े-रफ़्तार ये नहीं देखा
हमने देखि है इक जहाँ की चाल

लाखों पामाले-नाज़ हैं उनके
कौन समझे है इन बुताँ की चाल

कब्क को देख के ये कहने लगा
ये चले हैं हमारे हाँ की चाल

रख के शतरंजे-ग़ायबाना-ए-इश्क़
तुम चले इक तो इम्तहाँ की चाल

तिस पे दुश्मन हमारे जी की हुई
कजी-ए-पेले-आसमाँ की चाल

‘मुसहफ़ी भर चला वो रीशो-बरूत
हुए जस पीरे-नातवाँ की चाल

——————————————

आलीमरतबत के अज़ीमुश्शान दरबार में ग़ुलाम इब्ने-ग़ुलाम तुफ़ैल चतुर्वेदी की हाज़िरी

रँग चलते हों जैसे बांकी चाल
चाल है उसकी कहकशाँ की चाल

उसको देखा तो ढब गया अपना
कैसी रफ़्तार और कहाँ की चाल

बेरुख़ी उनकी ख़त्म कर देगी
देखियेगा मिरी फ़ुग़ाँ की चाल

चौकड़ी भरते हैं ग़िज़ाले-हर्फ़
शायरी है मियाँ ज़बाँ की चाल

क़ैस सहरा में छूट जायेगा
धीरे रख थोड़ी कारवाँ की चाल

मुझ चमन में बहार आते ही
तेज़ कितनी हुई ख़ज़ाँ की चाल

असदुल्लाह ख़ाँ से से सर न उठा 1
थी तजम्मुल हुसैन ख़ाँ की चाल

देर तक कुछ असर नहीं रखते
सूद का वार या ज़ियाँ की चाल

तुफ़ैल चतुर्वेदी                   09711296239

1=
दिया है ख़ल्क़ को भी ताउसे नज़र न लगे
बना है ऐश तज़म्मुल हुसैन ख़ाँ के लिए

तज़म्मुल हुसैन ख़ाँ फ़र्रुख़ाबाद के नवाब थे। ग़ालिब कई बार कलकत्ता आये-गए और आते-जाते उनके मेहमान रहे। ग़ालिब ने उनके इशरत के सिलसिले में ये शेर कहा है और उनके साथ शतरंज खेलते थे।

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23 comments on “T-26/34 रँग चलते हों जैसे बांकी चाल-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. चौकड़ी भरते हैं ग़िज़ाले-हर्फ़
    शायरी है मियाँ ज़बाँ की चाल

    haay kya andaaz hai….. bandagi !!!!

  2. Dada, apki ghazal padh kar kaif hasil hota hai, bahut umda kalam. Mubarakbad qubool farmayen

  3. बेरुख़ी उनकी ख़त्म कर देगी
    देखियेगा मिरी फ़ुग़ाँ की चाल
    चौकड़ी भरते हैं ग़िज़ाले-हर्फ़
    शायरी है मियाँ ज़बाँ की चाल
    क़ैस सहरा में छूट जायेगा
    धीरे रख थोड़ी कारवाँ की चाल
    मुझ चमन में बहार आते ही
    तेज़ कितनी हुई ख़ज़ाँ की चालwaah bhut umda

  4. waaaaa!! waaaaaah!! aur waaaaaah!!!

  5. आज कल चुलबुली ज़ुबान की शायरी अक्सर पढने में आती है, मगर इस ॻज़ल का शेड उस तरह का चुलबुला न हो कर कुछ-कुछ “देखो तो कितने फूल चमेली में आ गये” टाइप है। इन दो अशआर का तो क्या कहना:-

    चौकड़ी भरते हैं ग़िज़ाले-हर्फ़।
    शायरी है मियाँ ज़बाँ की चाल॥

    क़ैस सहरा में छूट जायेगा।
    धीरे रख थोड़ी कारवाँ की चाल॥

  6. Ustaadaana Ghazal, Badi uljhan me’n hu’n k kis sher ko qoute karu’n aur kis ko nahi’n, kis kis ki daad du’n yahaa’n to ” HAMAA’N KHAANA-E-OO AAFTAAB AST ” waala mu’aamla hai… Bahut saari daad pesh karta hu’n, Qabool kare’n.

    • करम शफ़ीक़ साहब, कुहनामश्क़ कुछ फ़रमायें तो जी बंधता है। नवाज़िश

  7. चौकड़ी भरते हैं ग़िज़ाले-हर्फ़
    शायरी है मियाँ ज़बाँ की चाल

    AAP KE LIYE HI YE SHER HAI MIYAN….WAAH WAAH …

  8. Jab Tufail Chaturvedi apni banki chal chalate hain to baki log apni chal hi bhool jate hain Is banki gazal ke liye badhai sweekaren ‘ chaukadi bharate hain gizale harf shairy hai miyan jaban ki chal’ behatarin gazal punah badhai

  9. दादा प्रणाम
    इस ‘चाल’
    का जवाब नही. चौकड़ी भरते ग़िज़ाले-हर्फ़ , रंगों और
    कहकशाँ को चलते हुए देखना ।बहुत उम्दा। ज़िंदाबाद।

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