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T-26/32 दिल ये मेरा निहाल था, क्या था-द्विजेन्द्र ‘द्विज’

हज़रते-मसहफी की ग़ज़ल जिस ज़मीन को तरह किया गया

ख़्वाब था या ख़याल था क्या था
हिज्र था या विसाल था क्या था

मेरे पहलू में रात जा कर वो
माह था या हिलाल था क्या था

चमकी बिजली सी पर न समझे हम
हुस्न था या जमाल था क्या था

शब जो दिल दो दो हाथ उछलता था
वज्द था या वो हाल था क्या था

जिस को हम रोज़-ए-हिज्र समझे थे
माह था या वो साल था क्या था

‘मुसहफ़ी’ शब जो चुप तू बैठा था
क्या तुझे कुछ मलाल था क्या था

———————————-

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ की तरही ग़ज़ल

दिल ये मेरा निहाल था, क्या था
और जो पायमाल था क्या था

बच निकालना मुहाल था क्या था
ख़ुदफ़रेबी का जाल था क्या था

अज़्म का वो ज़वाल था क्या था
मुझमें कुछ तो निढाल था क्या था

एक छब आ बसी थी आँखों में
माह था या हिलाल था क्या था

एक बादल- सा था जो आँखों में
आँसुओं का उबाल था क्या था

ज़िह्नो दिल पर घटा सी छाई थी
फिर भी रोना मुहाल था क्या था

बड़बड़ाये वो नींद में शब भर
लब पे मेरा सवाल था क्या था

वो नहीं था वहाँ मगर था भी
हिज्र था था या विसाल था क्या था

उसको देखा थिरक उठी रग-रग
धड़कनों का धमाल था क्या था

ऐसे उलझे निकल नहीँ पाये
तेरी गलियों का जाल था क्या था

रात भर गुफ़्तगू हुई जिससे
ख़ाब था या ख़याल था क्या था

महफ़िलें जिसके दम से रौशन थी
नूर था या जमाल था क्या था

जिस हसीं पर फ़िदा हुई आँखें
माह था या हिलाल था क्या था

बोल कब ख़ुद से था मुख़ातिब तू
‘द्विज’ तुझे कुछ मलाल था क्या था

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ 09418465008

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7 comments on “T-26/32 दिल ये मेरा निहाल था, क्या था-द्विजेन्द्र ‘द्विज’

  1. Dwij sb khoob sher nikale heiN aapne shandaar mafhoom ke saath.. daad hazir hai

  2. ज़िह्नो दिल पर घटा सी छाई थी
    फिर भी रोना मुहाल था क्या था

    बड़बड़ाये वो नींद में शब भर
    लब पे मेरा सवाल था क्या था

    वो नहीं था वहाँ मगर था भी
    हिज्र था था या विसाल था क्या था

    BEJOD GHAZAL BHAI….WAAH WAAH

  3. यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही अच्छी है मगर ये शेर तक़रीबन क़िता-बंद से हुए हैं अगर तरतीब दे दी जाये तो ख़ासा ख़ूबसूरत क़िता हो जायेगा। सुन्दर ग़ज़ल के लिये सैकड़ों दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    एक छब आ बसी थी आँखों में
    माह था या हिलाल था क्या था

    एक बादल- सा था जो आँखों में
    आँसुओं का उबाल था क्या था

    ज़िह्नो दिल पर घटा सी छाई थी
    फिर भी रोना मुहाल था क्या था

    बड़बड़ाये वो नींद में शब भर
    लब पे मेरा सवाल था क्या था

    वो नहीं था वहाँ मगर था भी
    हिज्र था था या विसाल था क्या था

    उसको देखा थिरक उठी रग-रग
    धड़कनों का धमाल था क्या था

    ऐसे उलझे निकल नहीँ पाये
    तेरी गलियों का जाल था क्या था

    रात भर गुफ़्तगू हुई जिससे
    ख़ाब था या ख़याल था क्या था

    महफ़िलें जिसके दम से रौशन थी
    नूर था या जमाल था क्या था

    जिस हसीं पर फ़िदा हुई आँखें
    माह था या हिलाल था क्या था

  4. बच निकालना मुहाल था क्या था
    ख़ुदफ़रेबी का जाल था क्या था

    अज़्म का वो ज़वाल था क्या था
    मुझमें कुछ तो निढाल था क्या था

    हर शे’र उम्‍दा है आदरणीय लेकिन ये दो साथ लिए जा रहा हूं मैं।

    वाह…वाह।।
    जिंदाबाद सर।

  5. Dwij Sahab bahut khoob gazal hui hae
    Daad hazir hae qubool kijeeye
    Sadar
    Pooja

  6. BBahut bahut achi gazal hui sir
    dili daad qubul kijiye
    SAdar

  7. Dwij sahab achchhe aur khoob sher nikaale hai’n BADHAAIYAA’N Qabool kare’n.

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