24 टिप्पणियाँ

T-26/31 मैं शजर हूँ और इक पत्ता है तू-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

हज़रते मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस ज़मीं को तरह किया गया

गरचे ऐ दिल आशिक़े-शैदा है तू
लेकिन अपने काम में यकता है तू

आशिक़ो-माशूक़ करता है जुदा
ऐ फ़लक ये काम भी करता है तू

लाख पर्दें गर हों तेरे हुस्न पर
कोई पर्दो में छुपा रहता है तू

हाले-दिल कहने लगूँ हूँ मैं तो शोख़
मुझ से यूँ कहता है “क्या बकता है तू”

पास बैठा उसके मैं रोया किया
यूँ न पूछा मुझसे “क्यों रोता है तू”

रात दिन तू है मिरी आग़ोश में
मैं तिरा साहिल मिरा दरिया है तू

बज़्म में उस तुन्द-ख़ू की दौड़ दौड़
काम क्या? क्यूँ? किस लिए जाता है तू

वां नहीं मुतलक तिरा मज़कूर भी
‘मुसहफ़ी’ किस बात पर भूला है तू

————————————-

इमरान हुसैन आज़ाद की तरही ग़ज़ल

मैं शजर हूँ और इक पत्ता है तू
मेरी ही तो शाख़ से टूटा है तू

शायरी में रोज़ तूफ़ाँ से लड़ा
क्या समंदर में कभी उतरा है तू

सुब्ह तक सहमी रहीं आँखे मिरी
ख़ाब! कैसी राह से गुज़रा है तू

क्या ख़बर कब साथ मेरा छोड़ दे
आँखों में ठहरा हुआ क़तरा है तू

लौट जाये जाने कब वो अपने घर
जा के बाहर मिल अगर प्यासा है तू

कुछ कमी शायद तिरी मिट्टी में है
जब समेटा दिल तुझे, बिखरा है तू

याद आईं सब पुरानी बारिशें
अब्र अब के साल यूँ बरसा है तू

वक़्ते-रुख़सत तो बुरा मत कह इसे
उम्र भर इस जिस्म में ठहरा है तू

बुज़दिली केवल मिरे अंदर है क्या
यूँ मुझे हैरत से क्यों तकता है तू

ये तिरी साज़िश है या फिर इत्तिफ़ाक़
मैं जहाँ डूबा वहीं उभरा है तू

जो अँधेरे में कहीं गुम हो गया
सोचता हूँ ,क्या वही साया है तू

क्या ख़बर मुख़बिर हवा का हो वही
ऐ दिये! जिसके लिए जलता है तू

तन्हा दोनों का नहीं कोई वजूद
मैं हूँ सानी, मिसरा-ए-ऊला है तू

ज़िन्दगी ने फिर तुझे उलझा लिया
मैं न कहता था अभी बच्चा है तू

‘मुसहफ़ी’ के ख़ानवादे की क़सम
शायरी की माँग का टीका है तू

इमरान हुसैन ‘आज़ाद’ 09536816624

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24 comments on “T-26/31 मैं शजर हूँ और इक पत्ता है तू-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

  1. सुब्ह तक सहमी रहीं आँखे मिरी
    ख़ाब! कैसी राह से गुज़रा है तू
    Waah waah….zindaabad

  2. तन्हा दोनों का नहीं कोई वजूद
    मैं हूँ सानी, मिसरा-ए-ऊला है तू
    imran sahab yun to poori ghazal achchhi hai
    lekin ye sher khaas taur pe pasand aayaa…mubarakbaad

  3. Imran miyan, apka maqta bata raha hai ki aap shayri ki mang ka teeka hain. bahut mubarak

  4. सुब्ह तक सहमी रहीं आँखे मिरी
    ख़ाब! कैसी राह से गुज़रा है तू

    Imran bhai bahut umdaa ghazal hui hai..dili daad

  5. Imran bhai ghazal meiN mehnat nazar aa rahi hai.. behad khoobsurat ghazal..

    waaaaaaaaah!!!

  6. इमरान मेरी जान ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद क्या क़यामत का शेर कहा है। आपकी ग़ज़ल ही अच्छी है अगर आप बस ये अकेला शेर ही कहते तो भी आपने इस ज़मीन में चांदनी बखेर दी होती। सैकड़ों दाद मरहबा मरहबा आफ़रीं आफ़रीं

    सुब्ह तक सहमी रहीं आँखे मिरी
    ख़ाब! कैसी राह से गुज़रा है तू

  7. सुब्ह तक सहमी रहीं आँखे मिरी
    ख़ाब! कैसी राह से गुज़रा है तू

    इमरान भाई।
    आपकी शायरी का फ़ैन हूं।
    सारी ग़ज़ल क्‍या खूब और ये शे’र मुझे मुझपर बीता हुआ लग रहा है इसलिए साथ लेकर जा रहा हूं। हमेशा याद रहेगा।

    मक्‍़ते का जो रंग है उसके लिए हज़ार बार दाद।
    सादर
    नवनीत

  8. Waaaahhhhh Imran bhai
    Kya umda gazal hui hae
    Dheron dher daad
    Pooja

  9. सुब्ह तक सहमी रहीं आँखे मिरी
    ख़ाब! कैसी राह से गुज़रा है तू
    क्या ख़बर कब साथ मेरा छोड़ दे
    आँखों में ठहरा हुआ क़तरा है तू
    लौट जाये जाने कब वो अपने घर
    जा के बाहर मिल अगर प्यासा है तू
    कुछ कमी शायद तिरी मिट्टी में है
    जब समेटा दिल तुझे, बिखरा है तू
    याद आईं सब पुरानी बारिशें
    अब्र अब के साल यूँ बरसा है तू
    waaaaah वाह क्या बात है बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई इमरान साहेब

  10. ‘मुसहफ़ी’ के ख़ानवादे की क़सम
    शायरी की माँग का टीका है तू…..jiyo imran shayri ki maang ka tum teeka ho aur hazarate mushafi ke khaanwaade se ho…main ummeed karta hoon ye baat hamesha achchi shayri ki taraf le jaayegi tumhe…mubarakbaad aur khoob saari duaayen..

  11. Ghazal par daad haazir hai janaab-e-aali
    qabool kare’n

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