15 टिप्पणियाँ

T-26/25 उनकी आमद है गुलफ़िशानी है-आलोक मिश्रा

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया

ज़ख़्म है और नमक-फ़िशानी है
दोस्ती दुश्मनी ए जानी है

नक़्शे-ए-अव्वल है चेहरा-ए-यूसूफ़
और तिरा चेहरा नक़्शे-सानी है

तेरे कूचे से मानी-ए-रफ़्तार
हम को अपनी ही नातवानी है

उस पे परवाने गो हुजूम करें
शम’अ की वो ही कमज़बानी है

इस सरा में सभी मुसाफ़िर हैं
यानी जो है सो कारवानी है

आलम उसकी सफ़ा का मुझसे न पूछ
नज़्म में तेरी जो रवानी है

मुसहफ़ी शेरे-सादा कहने में
वक़्त का अपने तो फ़ुग़ानी है

———————————-

आलोक मिश्रा साहब की तरही ग़ज़ल

उनकी आमद है गुलफ़िशानी है
रंगो-खुश्बू की मेज़बानी है

कैसी होगी न जाने शामे-उम्र
सुब्ह जब ऐसी सरगिरानी है

मौत का कुछ पता नहीं लेकिन
ज़िन्दगी सिर्फ़ नौहाख़्वानी है

मरने वाला है मरकज़ी किरदार
आख़िरी मोड़ पर कहानी है

ख़ुदकुशी जैसी कोई बात नहीं
इक ज़रा मुझको बदगुमानी है

ये जो बारूद है हवाओं में
आग थोड़ी सी बस लगानी है

अपने दिल में सजा लिया है तुम्हें
हिज्र को अब के मुंह की खानी है

सारी कठिनाइयां हुई हैं सरल
जब से जीने की हमने ठानी है

उसका लिक्खा ही जी रहा हूँ मैं
उसकी बाबत ही ये कहानी है

आलोक मिश्रा 09876789610

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15 comments on “T-26/25 उनकी आमद है गुलफ़िशानी है-आलोक मिश्रा

  1. उम्दा ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद क़ुबूल फरमाएं आलोक जी

  2. मरने वाला है मरकज़ी किरदार
    आख़िरी मोड़ पर कहानी है
    क्या खूब ..लाजवाब ग़ज़ल आलोक भाई ..बधाई

  3. आलोक! दिल ख़ुश कर दिया। अच्छी ग़ज़ल पढवायी। जीते रहिये

  4. हाय क्या क़ाफ़िया निभाया है। एक शेर ही दिल नोचे ले रहा है। वाह वाह ज़िंदाबाद

    मरने वाला है मरकज़ी किरदार
    आख़िरी मोड़ पर कहानी है

  5. उसका लिक्खा ही जी रहा हूँ मैं
    उसकी बाबत ही ये कहानी है

    आलोक भाई।
    आपकी ग़ज़ल पढ़ कर गहरी उदासी आती है। यह उदासी सिंथेटिक नहीं लगती। बहुत रियल। अपनी ग़ज़लें मुझे दे दीजिए भाई।

    सादर
    नवनीत

  6. अलोक भाई
    मुरस्सा ग़ज़ल है

    उनकी आमद है गुलफ़िशानी है
    रंगो-खुश्बू की मेज़बानी है
    मासूमियत भरा अंदाज़ !

    मरने वाला है मरकज़ी किरदार
    आख़िरी मोड़ पर कहानी है
    बहुत उम्दा है !

    ये जो बारूद है हवाओं में
    आग थोड़ी सी बस लगानी है
    आज का सच दो मिसरों में बयां हुआ है !

  7. alok bahut achchi ghazal kahi
    अपने दिल में सजा लिया है तुम्हें
    हिज्र को अब के मुंह की खानी है

    मरने वाला है मरकज़ी किरदार
    आख़िरी मोड़ पर कहानी है
    ye do sher bahut pasand aaye
    mubarakbaad

  8. ख़ुदकुशी जैसी कोई बात नहीं
    इक ज़रा मुझको बदगुमानी है

    ये जो बारूद है हवाओं में
    आग थोड़ी सी बस लगानी है

    अपने दिल में सजा लिया है तुम्हें
    हिज्र को अब के मुंह की खानी है

    सारी कठिनाइयां हुई हैं सरल
    जब से जीने की हमने ठानी है
    बहुत प्यारी ग़ज़ल हुई आलोक भैया
    दिली दाद क़ुबूल करे

  9. आलोक मिश्रा साहिब इस ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद

  10. जनाब आलोक मिश्रा साहिब इस मुरस्सा ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें

    समर कबीर

  11. जनाब आलोक मिश्रा साहिब इस मुरस्सा ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें

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