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T-25/23 साक़ी की निग़ाहों का तलबगार किधर है-दिनेश कुमार

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी साहब की ग़ज़ल जिसकी ज़मीन को तरह किया गया

दिल सीने में बेताब है दिलदार किधर है
कुइ मुझ को बता दो वो मिरा यार किधर है

हम कब से चमन-ज़ार में बेहोश पड़े हैं
मालूम नहीं गुल किधर और ख़ार किधर है

उस गुल का पता गर नहीं देते हो तो यारों=
इतना ही बता दो दरे-गुलज़ार किधर है

दिल छीनने वाले कोई घर बैठ रहे हैं
पूछे हैं यही रस्ता-ए-बाज़ार किधर है

देखा मुझे कल उसने तो ग़ैरों से ये बोला
लाओ भी शिताबी मिरी तलवार किधर है

याँ हो रहा है सीना मेरा आगे ही छलनी
ढूँढे है कहाँ तीर को सोफ़ार किधर है

अहवाल निपट तंग है बीमार का तेरे
इस वक़्त तू ऐ आइना-रुख़सार किधर है

शीरीं-सुख़नां सब ही शुक्र बेचे हैं लेकिन
इंसाफ़ करो जोशे-ख़रीदार किधर है

बरसों न मिले उस से तो उस शोख़ ने हमको
पूछा न कभी ‘मुसहफ़ी’-ए-ज़ार किधर है

——————————————-

दिनेश कुमार साहब की तरही ग़ज़ल

साक़ी की निग़ाहों का तलबगार किधर है
हैरां है ये मयखाना कि मय-ख़्वार किधर है

जो साथ तुम्हारे थी वो तलवार किधर है
सर को तो बचा लाये हो दस्तार किधर है

क्यूँ सबने ही हाकिम की तरफ ऊँगली उठाई
मुन्सिफ़ ने तो पूछा था गुनहगार किधर है

जो रोज़ कुआँ खोदते हैं प्यास बुझाते
उनके लिए इस देश में सरकार किधर है

आँखो से नुमाया है हवस जिस्म की लेकिन
दिलबर के लिए दिल में तिरे प्यार किधर है

सरगोशियाँ करती है हवा कान में मेरे
क्यूँ आज अकेले हो, दिल-आज़ार किधर है

बाज़ारे-वफ़ा में कोई मुझको ये बताये
टूटे हुए ख़्वाबों का ख़रीदार किधर है

खुद जिस से महकती थी कभी बादे-सबा भी
पूछे है वही अब रहे-गुलज़ार किधर है

खुश हो लिए हम मुसहफ़ी की तर्ज़ पे कह कर
पर शेरों में वो ख़ूबी–ए-गुफ़्तार किधर है

दिनेश कुमार 09896755813

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11 comments on “T-25/23 साक़ी की निग़ाहों का तलबगार किधर है-दिनेश कुमार

  1. बहुत अच्छे शेर निकाले हैं,दिनेश जी आपने। वाह…..वाह

    • मेरा कमेन्ट पहले अनाम के नाम से चला गया इसलिए दुबारा पोस्ट कर रहा हूँ।
      *****************************************************************************
      बहुत अच्छे शेर निकाले हैं,दिनेश जी आपने। वाह…..वाह

  2. दिनेश साहब दिनोंदिन निखार आता जा रहा है। इसी साबितक़दमी से चलते रहें। कामयाब ग़ज़ल पर मुबारकबाद

  3. जो साथ तुम्हारे थी वो तलवार किधर है
    सर को तो बचा लाये हो दस्तार किधर है

    क्यूँ सबने ही हाकिम की तरफ ऊँगली उठाई
    मुन्सिफ़ ने तो पूछा था गुनहगार किधर है

    जो रोज़ कुआँ खोदते हैं प्यास बुझाते
    उनके लिए इस देश में सरकार किधर है

    आँखो से नुमाया है हवस जिस्म की लेकिन
    दिलबर के लिए दिल में तिरे प्यार किधर है

    बधाई बहुत खूबसूरत शायरी है

  4. दिनेश भाई

    सरगोशियाँ करती है हवा कान में मेरे
    क्यूँ आज अकेले हो, दिल-आज़ार किधर है
    अच्छी ग़ज़ल का अच्छा शेर !

  5. बाज़ारे-वफ़ा में कोई मुझको ये बताये
    टूटे हुए ख़्वाबों का ख़रीदार किधर है
    dinesh kumar sahab mubarakbaad

  6. bahot achchi ghazal… Mubafak

  7. ज़िंदाबाद ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद और मुबारकबाद क़ुबूल करें।
    जो साथ तुम्हारे थी वो तलवार किधर है
    तुम सर की तो ले आये हो दस्तार किधर है

    वाह वाह वाह ।

  8. जनाब दिनेश कुमार जी वाह वाह वाह बहुत खूब। शानदार ग़ज़ल कही है आपने शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें

    समर कबीर

  9. जनाब दिनेश कुमार जी वाह वाह वाह बहुत खूब। शानदार ग़ज़ल कही है आपने शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें

  10. Dinesh sahab kya achche ashaar nikale hain aapne… Maujooda aur guzishta adab ki khushboo ek saath…

    सरगोशियाँ करती है हवा कान में मेरे
    क्यूँ आज अकेले हो, दिल-आज़ार किधर है
    बाज़ारे-वफ़ा में कोई मुझको ये बताये
    टूटे हुए ख़्वाबों का ख़रीदार किधर है

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