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T-26/19 मुन्तज़र ही नहीं है जब कोई-द्विजेन्द्र द्विज

हज़रते मुसहफ़ी साहब की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया

कह गया कुछ तो ज़ेरे-लब कोई
जान देता है बेसबब कोई

जावे क़ासिद उधर तो ये कहियो
राह तकता है रोज़ो-शब कोई

गो कि आंखों में अपनी आवे जान
मुंह दिखाता है हमको कब कोई

बन गया हूं मैं सूरते-दीवार
सामने आ गया है जब कोई

जबकि हमसाये उस परी के रहे
न मिला झांकने का ढब कोई

हद ख़ुश आया ये शेरे-’मीर’ मुझे
कर के लाया था मुंतख़ब कोई

अब ख़ुदा मग़फ़िरत करे उसकी
’मीर’ मरहूम था अजब कोई

ए फ़लक उसको तू ग़नीमत जान
‘मुसहफ़ी’ सा नहीं है अब कोई

““““““““““““““““““““““““““`

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ साहब की तरही की ग़ज़ल

मुन्तज़र ही नहीं है जब कोई
कैसे आएगा बेसबब कोई

इससे बढ़ कर नहीं ग़ज़ब कोई
ज़िन्दगी का नहीं है ढब कोई

मुझको हैरत से तकती है दुनिया
कर गया मुझको मुन्तख़ब कोई

तेरी क़ुदरत के सब करिश्मे हैं
जाँसिताँ कोई जाँबलब कोई

सुन बे ‘रब’ ‘रब’ पुकारने वाले
तू बता है तिरा भी रब कोई

देख ली हमने ये दुनिया यारो
और बाक़ी नहीं तलब कोई

आख़िरी सफ़ में बैठना था जिसे
उसको पहचानता भी कब कोई

कब का बाहर निकल गया वरना
मुझमें इन्सान था ग़ज़ब कोई

आती थीं इस मकाँ से आवाज़ें
इसमें रहता नहीं है अब कोई

‘द्विज’ तिजारत के इस ज़माने में
किस पे मरता है बेसबब कोई

द्विजेन्द्र द्विज 09418465008

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9 comments on “T-26/19 मुन्तज़र ही नहीं है जब कोई-द्विजेन्द्र द्विज

  1. आख़िरी सफ़ में बैठना था जिसे
    उसको पहचानता भी कब कोई

    Aha Ha ha…Kya kahen …? is sher ke baad na kuchh padhne ko bachta hai n kehne ko…bejod ghazal hai Dwij ji…Bemisal…Aapke hunar ko salaam…

    Neeraj

  2. वाह वाह सैकड़ों दाद इस शेर पर। ये सैकड़ों अशआर पर भारी शेर है

    आख़िरी सफ़ में बैठना था जिसे
    उसको पहचानता भी कब कोई

  3. जनाब द्विजेन्द्र ‘द्विज’ साहिब… वाह वाह वाह.. बहुत शानदार ग़ज़ल कही आपने.. शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं।

  4. आख़िरी सफ़ में बैठना था जिसे
    उसको पहचानता भी कब कोई

    कब का बाहर निकल गया वरना
    मुझमें इन्सान था ग़ज़ब कोई

    आती थीं इस मकाँ से आवाज़ें
    इसमें रहता नहीं है अब कोई

    waah kya kehne ..Bahut umdaa ghazal hui hai Dwij Sahab ..daad

  5. प्रणाम sir

    बहुत प्यारी ग़ज़ल कही है sir। और लम्बे अरसे के बाद आपकी नई ग़ज़ल का लुत्फ़ मिला।

    आती थीं इस मकाँ से आवाज़ें
    इसमें रहता नहीं है अब कोई

    बेमिसाल शेर् हुआ है सर।

    कब का बाहर निकल गया वरना
    मुझमें इन्सान था ग़ज़ब कोई

    ये शेर भी बहुत बढ़िया हुआ है लेकिन आप में तो अब भी गज़ब का इंसान है, और जो हर रोज़ बेहतर होता जाता है।

  6. सुन बे ‘रब’ ‘रब’ पुकारने वाले
    तू बता है तिरा भी रब कोई
    देख ली हमने ये दुनिया यारो
    और बाक़ी नहीं तलब कोई
    आख़िरी सफ़ में बैठना था जिसे
    उसको पहचानता भी कब कोई
    कब का बाहर निकल गया वरना
    मुझमें इन्सान था ग़ज़ब कोई
    आती थीं इस मकाँ से आवाज़ें
    इसमें रहता नहीं है अब कोई
    ‘द्विज’ तिजारत के इस ज़माने में
    किस पे मरता है बेसबब कोईवाह वाह मुबारक हो द्विज साहेब कमाल के अशआर

  7. सुन बे ‘रब’ ‘रब’ पुकारने वाले
    तू बता है तिरा भी रब कोई

    देख ली हमने ये दुनिया यारो
    और बाक़ी नहीं तलब कोई

    आख़िरी सफ़ में बैठना था जिसे
    उसको पहचानता भी कब कोई

    कब का बाहर निकल गया वरना
    मुझमें इन्सान था ग़ज़ब कोई

    आती थीं इस मकाँ से आवाज़ें
    इसमें रहता नहीं है अब कोई
    बहुत प्यारी ग़ज़ल सर
    दिली दाद हाज़िर है
    सादर

  8. इससे बढ़ कर नहीं ग़ज़ब कोई
    ज़िन्दगी का नहीं है ढब कोई

    सुन बे ‘रब’ ‘रब’ पुकारने वाले
    तू बता है तिरा भी रब कोई

    बहुत अच्छी ग़ज़ल द्विज साहब.
    मुबारक़.

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