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T-26/16 बयाँ कैसे करूँ क्या उसकी अंगड़ाई का आलम था-समर कबीर

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस ज़मीन को तरह किया गया

शबे-हिज्राँ में था मैं और तन्हाई का आलम था
ग़रज़ उस शब अजब ही बे-सरो-पाई का आलम था

गिरेबाँ ग़ुंचा-ए-गुल ने किया गुलशन में सौ टुकड़े
कि हर फुंदुक़ पर उस के तुर्फ़ा रानाई का आलम था

निहाले-ख़ुश्क हूँ मैं अब तो यारो क्या हुआ यानी
कभी इस बेदे-मजनूँ पर भी शैदाई का आलम था

लिखे गर जा-ओ-बेजा शेर मैं ने डर नहीं उस का
कि मैं याँ था सफ़र में मुझ पे बेजाई का आलम था

हिना भी तो लगा देखी प वो आलम कहाँ है अब
हमारे ख़ूँ से जो हाथों पे जे़बाई का आलम था

चला जब शहर से मजनूँ तरफ़ सहरा की यूँ बोला
नसीब अपने तो इस आलम में रुसवाई का आलम था

ये आलम हम ने देखा ‘मुसहफ़ी’ हाँ अपनी आँखों से
कि बंदा जी से उस माशूक़ हरजाई का आलम था

——————————————-

समर कबीर साहब की तरही ग़ज़ल नं-3

बयाँ कैसे करूँ क्या उसकी अंगड़ाई का आलम था
तसव्वुर में न आए ऐसा ज़ेबाई का आलम था

बस इक नुक्ते प आकर रुक गई थी ज़िन्दगी मेरी
न वो वहशत का आलम था न दानाई का आलम था

कोई सुनता भी कैसे एक शाइर की सदा भाई
वतन में हर तरफ़ हंगामा-आराई का आलम था

अँधेरे में गिरी सूई भी हम तो ढूँढ लेते थे
जवानी में तो कुछ ऐसा ही बीनाई का आलम था

ग़ज़ल कहने का मौक़ा ख़ूब हम को मिल गया यारों
नहीं था घर में कोई सिर्फ़ तन्हाई का आलम था

पसे-मुर्दन दरो-दीवार घर के सब सुना देंगे
कि तेरे हिज्र में क्या तेरे सौदाई का आलम था

जिसे हम शाइरी कहते हैं मुश्किल से मिली हम को
“समर” दुनिया-ए-फ़न में भी तो मंहगाई का आलम था

“समर कबीर” 09753845522

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4 comments on “T-26/16 बयाँ कैसे करूँ क्या उसकी अंगड़ाई का आलम था-समर कबीर

  1. इतनी पथरीली, संगलाख़ ज़मीं और ऐसी ग़ज़ल ? ? ? समर साहब ये आप ही का काम है । बंजर ज़मीन में फूल खिला दिये वाह वाह सैकड़ों दाद

  2. Waah…Samar sahab
    Achhi gazal hui hae.
    Dili daad qubool karein
    Sadar
    Pooja

  3. बयाँ कैसे करूँ क्या उसकी अंगड़ाई का आलम था
    तसव्वुर में न आए ऐसा ज़ेबाई का आलम था
    बस इक नुक्ते प आकर रुक गई थी ज़िन्दगी मेरी
    न वो वहशत का आलम था न दानाई का आलम
    था
    कोई सुनता भी कैसे एक शाइर की सदा भाई
    वतन में हर तरफ़ हंगामा-आराई का आलम था
    अँधेरे में गिरी सूई भी हम तो ढूँढ लेते थे
    जवानी में तो कुछ ऐसा ही बीनाई का आलम
    था
    ग़ज़ल कहने का मौक़ा ख़ूब हम को मिल गया
    यारों
    नहीं था घर में कोई सिर्फ़ तन्हाई का आलम था
    waah waaah bhut bhut khoob samar saaheb

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