8 टिप्पणियाँ

T-26/15 चाल अपनी अदा से चलते हैं-बकुल देव

हज़रत ग़ुलाम हम्दानी मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिसकी ज़मीन को तरह किया गया

आतिशे-ग़म में इस के जलते हैं
शम्मा साँ उस्तुख़्वाँ पिघलते हैं

वही दश्त और वही गिरेबाँ चाक
जब तलक हाथ पाँव चलते हैं

देख तेरी सफ़ा-ए-सूरत को
आइने मुँह से ख़ाक मलते हैं

जोशिशी अश्क है वो आँखों में
जैसे उस से कुएँ उबलते हैं

देख आरिज़ को तेरे गुलशन में
सैकड़ों रंग गुल बदलते हैं

शोख़-चश्मी बुताँ की मुझ से न पूछ
कि ये नज़रों में दिल को छलते हैं

देखियो शैख़ जी की चाल को टुक
अब कोई दम में से फिसलते हैं

बिन लिए काम दिल का उस कू से
‘मुसहफ़ी’ हम कोई निकलते हैं

————————————–

बकुल देव साहब की तरही ग़ज़ल

चाल अपनी अदा से चलते हैं
हम कहां कजरवी से टलते हैं

ज़िन्दगी बेरुख़ी से पेश न आ
तुझ पे अहसां मिरे निकलते हैं

कारदां हैं बला के सब चेहरे
आइने को हुनर से छलते हैं

कोई आतश फ़िशां है सीने में
अश्क मिस्ले-शरर निकलते हैं

उसके तर्ज़े-सुख़न के मारे लोग
अपना लहजा कहां बदलते हैं

आज सो लूं कि है सहूलते-शब
दिन कहां रोज़ रोज़ ढलते हैं

आ गयी लौ ख़िजां की परबत तक
वादियों में चिनार जलते हैं

पंजा-ए-ज़ह्न के तले पैहम
ताइरे-दिल कई मचलते हैं

ख़्वाब का जिन न आएगा बाहर
बेसबब आप आंख मलते हैं

तुझ से क़िरदार हों बकुल जिनमें
ऐसे क़िस्से कहां संभलते हैं

बकुल देव 09672992110

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8 comments on “T-26/15 चाल अपनी अदा से चलते हैं-बकुल देव

  1. प्यारे अपने बुज़ुर्गों का सा लहजा उतर आया। सहीह दिशा सहीह रफ़्तार, बहुत अच्छे जा रहे हैं वाह वाह

    कोई आतश फ़िशां है सीने में
    अश्क मिस्ले-शरर निकलते हैं

    आज सो लूं कि है सहूलते-शब
    दिन कहां रोज़ रोज़ ढलते हैं

  2. Bakul Saheb, koi eik adh sheir nahin jo quoatable ho balki tamaam ghazal hi quotable hai. mubarak

  3. बहुत उम्दा ग़ज़ल बकुलजी
    ढेरों दाद
    सादर
    पूजा

  4. जनाब बकुल देव साहिब… बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने… शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें।

  5. ज़िन्दगी बेरुख़ी से पेश न आ
    तुझ पे अहसां मिरे निकलते हैं

    कारदां हैं बला के सब चेहरे
    आइने को हुनर से छलते हैं

    कोई आतश फ़िशां है सीने में
    अश्क मिस्ले-शरर निकलते हैं

    उसके तर्ज़े-सुख़न के मारे लोग
    अपना लहजा कहां बदलते हैं

    आज सो लूं कि है सहूलते-शब
    दिन कहां रोज़ रोज़ ढलते हैं

    बहुत अच्छी ग़ज़ल पेश की है
    मुबारक ।

  6. ख़्वाब का जिन न आएगा बाहर
    बेसबब आप आंख मलते हैं

    तुझ से क़िरदार हों बकुल जिनमें
    ऐसे क़िस्से कहां संभलते हैं
    Wahhhhhhh Wahhhhhhh
    Bahut achi gazal hui sir
    dili daad qubul karen

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