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T-26/14 उस नजर में सवाल था, क्‍या था-नवनीत शर्मा

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस ज़मीं को तरह किया गया

ख़्वाब था या ख़याल था क्या था
हिज्र था या विसाल था क्या था

मेरे पहलू में रात जा कर वो
माह था या हिलाल था क्या था

चमकी बिजली सी पर न समझे हम
हुस्न था या जमाल था क्या था

शब जो दिल दो दो हाथ उछलता था
वज्द था या वो हाल था क्या था

जिस को हम रोज़-ए-हिज्र समझे थे
माह था या वो साल था क्या था

‘मुसहफ़ी’ शब जो चुप तू बैठा था
क्या तुझे कुछ मलाल था क्या था

———————————

नवनीत शर्मा की तरही ग़ज़ल

उस नजर में सवाल था, क्‍या था
वो जो जी में उछाल था, क्‍या था

वक्‍ते-रुख़सत लहू-लहू मंज़र
वो लहू में उबाल था, क्‍या था

हंसते हंसते छलक आये आंसू
ये ख़ुशी थी, मलाल था, क्‍या था

तेरे पहलू में रो रहा था मैं
हिज्र था या विसाल था, क्‍या था

एक तस्‍वीर से रहा रौशन
फिर भी दिल पायमाल था, क्‍या था

जानिबे-इश्‍क़ चल दिए लेकिन
था वो रस्‍ता कि जाल था, क्‍या था

पांव फिसला, संभल नहीं पाए
इश्‍‍क़ दरिया था ताल था, क्‍या था

साथ रह कर वो दूर थे कितने
थी हक़ीक़त, ख़याल था, क्‍या था

बाद जिसके नहीं दिखा कुछ भी
नूर इक लाज़वाल था, क्‍या था

उंगलियां हिज्र की छपीं जिस पर
वस्‍ल का नर्म गाल था, क्‍या था

फिर महब्‍बत बहुत हुई खुद से
तुझ ऩजर का कमाल था, क्‍या था

बोझ खुद का हँसी-ख़ुशी ढोया
फिर भी जीना मुहाल था, क्‍या था

ख़ुद को खोने के बाद वाे दिल में
वलवला था बवाल था, क्‍या था

जिंदगी ने भवें तरेरी जब
अब कहो भी, हिलाल था, क्‍या था

याद में रोना और लहू रोना
अांसुओं का अकाल था, क्‍या था

आख़िरश दिल के हो गए टुकड़े
लूट का कोई माल था क्‍या था

जो मुअत्‍तल हुआ मिरे अंदर
तुझ नजर में बहाल था क्‍या था

आज ‘नवनीत’ रो नहीं पाया
उसका जज्‍़बा निढाल था, क्‍या था

नवनीत शर्मा 9418040160

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23 comments on “T-26/14 उस नजर में सवाल था, क्‍या था-नवनीत शर्मा

  1. कभी-कभार ही ऐसे शेर होते हैं मगर आप हर ग़ज़ल में ऐसे फूल खिलाने लगे हैं। कामयाबी की मंज़िल पर क़दम पड़ने लगे। वाह वाह दाद सैकड़ों दाद

    हंसते हंसते छलक आये आंसू
    ये ख़ुशी थी, मलाल था, क्‍या था

    तेरे पहलू में रो रहा था मैं
    हिज्र था या विसाल था, क्‍या था

    पांव फिसला, संभल नहीं पाए
    इश्‍‍क़ दरिया था ताल था, क्‍या था

    याद में रोना और लहू रोना
    अांसुओं का अकाल था, क्‍या था

  2. Baad jis k nahi’n dikha kuchh bhi
    Noor ik Laa-zawaal tha kya tha

    Waah waah jitni bhi daad di jaaye kam hai
    ” UN KA JALWA UN KA JALWA THA BHALA KYA DEKHTE
    JAB NAZAR UT’THI TO YE DEKHA K BEE-NAAYI GAI”
    (Ghulam Mohd Marham)
    Dhero’n daad

  3. umda ghazal ke liye mubarakbad.

  4. Navneet ji shandaar kalaam pesh kiya aapne.. waaaaah

    haste haste chalak aae…

    is sher par alag se daad!! waaah!!!

  5. Navneet ji saheb, wah wah ,khoobsurat ghazal hui hai

  6. हंसते हंसते छलक आये आंसू
    ये ख़ुशी थी, मलाल था, क्‍या था
    क्या ही उम्दा शेर हुआ है नवनीत जी।
    वाह….
    ढेरों दाद
    सादर
    पूजा

  7. जनाब नवनीत शर्मा जी… वाह वाह बहुत ख़ूब ग़ज़ल कही है आपने शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें

    • जनाब समर कबीर साहब।
      आप जैसे शायर से दाद मिली, धन्‍य हुआ।
      आभार।
      सादर
      नवनीत

  8. वाह sir
    ज़िंदाबाद।
    बेमिसाल ग़ज़ल। इस तरही का अंदाज़ क़माल है। एक से बढ़ कर एक ग़ज़लें पढ़ने को मिली। आप ने लूट लिया।
    हार्दिक बधाई

  9. Zindabad bhaiya..puri ki puri ghazal behad shandar hai waahhh

    • प्रिय भाई कान्‍हा जी,
      बेहद शुक्रिया। आपकी महब्‍बत जिंदाबाद।
      सस्‍नेह।
      नवनीत

  10. वक्‍ते-रुख़सत लहू-लहू मंज़र
    वो लहू में उबाल था, क्‍या था

    हंसते हंसते छलक आये आंसू
    ये ख़ुशी थी, मलाल था, क्‍या था

    तेरे पहलू में रो रहा था मैं
    हिज्र था या विसाल था, क्‍या था

    एक तस्‍वीर से रहा रौशन
    फिर भी दिल पायमाल था, क्‍या था

    जानिबे-इश्‍क़ चल दिए लेकिन
    था वो रस्‍ता कि जाल था, क्‍या था
    Bahut pyari gazal hui sir
    dili daad qubul karen
    SAdar

    • नवनीत जी। सदा की तरह एक बेहतरीन मुक़म्मल ग़ज़ल।किस किस शेर पर कहूँ। मुसहफ़ी साहब की ज़मीन को आसमां क्र दिया आपने।

      • आपका बहुत आभार। आपका नाम पता नहीं चल पाया लेकिन महब्‍बत झलक रही है।
        सादर
        नवनीत

    • इमरान भाई।
      सच यह है कि आपकी महब्‍बत बहुत है मेरे लिए।
      इसे हरदम बनाए रखें।
      सादर
      नवनीत

    • इमरान भाई।
      सच यह है कि आपकी महब्‍बत बहुत है मेरे लिए।
      इसे हरदम बनाए रखें।
      सादर
      नवनीत

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