17 टिप्पणियाँ

T-26/12 उठानी थी हम को सलाहों की गठरी – नवीन

हज़रते-मुसहफ़ी साहब की ग़ज़ल जिसे तरह के लिये चुना गया

चले ले के सर पै गुनाहों की गठरी
सफ़र में ये है रू-सियाहों की गठरी

पड़ी रोज़-ए-महशर वहीं बर्क़ आ कर
जहाँ थी तेरे दाद-ख़्वाहों की गठरी

मुसाफ़िर मैं उस दश्त का हूँ कि जिस में
लुटी कितने गुम-कर्दा राहों की गठरी

जहाँ सूस ने बह्र से सर निकाला
मैं समझा है कश्ती तबाहों की गठरी

कुलाहे-ज़री माहे-नौ ने उड़ा ली
खुली थी कहीं कज-कुलाहों की गठरी

हम उन सरक़ा वालों में ऐ ‘मुसहफ़ी’ हैं
चुराते हैं जो बादशाहों की गठरी

—————————–

नवीन सी चतुर्वेदी की तरही ग़ज़ल

उठानी थी हम को सलाहों की गठरी।
मगर ढो रहे हैं गुनाहों की गठरी॥

कबीर आप जैसे जुलाहों की गठरी।
कहाँ खो गई ख़ैर-ख़्वाहों१ की गठरी॥
१ शुभ-चिन्तकों

मुक़द्दर में ज़ख़्मात लिक्खे थे अपने।
सो ढोनी पड़ी हम को फ़ाहों२ की गठरी॥
२ घाव पर लगाया जाने वाला रूई का फ़ाहा

उदासी को सब पर भरोसा नहीं था।
कहाँ सब को सौंपी है आहों की गठरी॥

हमारे लिये तो मुहब्बत का मतलब।
मुरव्वत से भीनी निगाहों की गठरी॥

तुम्हारा हृदय तो नगीना है साहब।
हमारा हृदय है पनाहों की गठरी॥

ये हलकी है गुल-फूल से भी यक़ीनन।
उठा कर तो देखो निबाहों की गठरी॥

हमारे ही सपने हैं पलकों के पीछे।
अमाँ खोलिये तो गवाहों की गठरी॥

समय की अदालत में वो भी हैं मुन्सिफ़।
“चुराते हैं जो बादशाहों की गठरी”॥

‘नवीन’ एक और ज़ाविये३ के मुताबिक़।
लगे है ख़ला! ख़ानक़ाहों४ की गठरी॥

३ दृष्टिकोण ४ गुफाओं

नवीन सी चतुर्वेदी 09967024593

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About Navin C. Chaturvedi

www.saahityam.org 09967024593 navincchaturvedi@gmail.com http://vensys.in

17 comments on “T-26/12 उठानी थी हम को सलाहों की गठरी – नवीन

  1. ज़ोरदार ग़ज़ल बढ़िया कही वाह वाह मुबारकबाद

  2. Navin sahab Ghazal par dher saari daad o Mubaarakbaad

  3. Naveen is radeef ko nibhana aur aise kawafi ke saath.. kamaal hai.. waaaaah!!!

  4. अच्छी ग़ज़ल हुई है नवीन जी।
    दिली दाद
    सादर
    पूजा

  5. जनाब नवीन साहिब… वाह वाह..अच्छी ग़ज़ल कही है आपने.. शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें।

  6. उदासी को सब पर भरोसा नहीं था।
    कहाँ सब को सौंपी है आहों की गठरी॥

    वाह

  7. Naveen saheb, Aap ki ghazal padhkar yun lag raha tha jaise ki ustad ki hi ghazal hai. Wah.

  8. वाह, हमेशा की तरह बेहद हसीन पेशकश, क्या कहने

  9. उदासी को सब पर भरोसा नहीं था।
    कहाँ सब को सौंपी है आहों की गठरी॥

    kya accha she’r hua hai navin ji… daad qubulen

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