19 टिप्पणियाँ

T-26/11 हसरते-मजबूर है या दिल ही है बेताब सा-मुमताज़ नाज़ां

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस ज़मीन को तरह किया गया

आज कुछ सीने में दिल है ख़ुद ब ख़ुद बेताब सा
कर रहा है बेक़रारी पारा-ए-सीमाब सा

जूँ गुले-तर क्या है उससे झलके है उसका बदन
वो जो पैराहन गले में उसके है इक आब सा

मैं हूँ, और ख़िलवत है और पेशे-नज़र माशूक़ है
है तो बेदारी वले कुछ देखता हूँ ख़्वाब सा

कल शबे-तारीक में जूँ ही हुआ वो बेनक़ाब
जल्वागर रू-ए-ज़मीं पर हो गया महताब सा

क्या कहूँ हुस्नो-लताफ़त जामा-ए-शबनम से है
निकला ही पड़ता है वो गोरा बदन मेहताब सा

——————————————

मुमताज़ नाज़ां साहिबा की तरही ग़ज़ल

हसरते-मजबूर है या दिल ही है बेताब सा
कुछ तो सीने में मचलता रहता है सीमाब सा

दिल के सहरा में कहाँ से आ गया सैलाब सा
आज आँखों में उतर आया है फिर क्यूँ आब सा

टीसता रहता है पल-पल रोज़ो-शब मेरा बदन
ज्यूँ रगों में गर्दिशें करता हो कुछ तेज़ाब सा

नींद में चलते रहे हैं ज़ीस्त की राहों पे हम
वक़्त जो गुज़रा है अब तक, लग रहा है ख़्वाब सा

हम को लंबी ज़िन्दगी की देते जाते हैं दुआ
बेमुरव्वत हो न कोई या ख़ुदा अहबाब सा

हम तो समझे हो गया पूरा निसाबे-ज़िन्दगी
सामने लेकिन खुला है फिर नया इक बाब सा

आज फिर “मुमताज़” मौजें याद की हैं तैश में
ज़िन्दगी की झील में फिर पड़ गया गिर्दाब सा

मुमताज़ नाज़ां 09867641102-09892800600

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

19 comments on “T-26/11 हसरते-मजबूर है या दिल ही है बेताब सा-मुमताज़ नाज़ां

  1. कैसी सख़्त ज़मीन और कैसे रवां-दवां शेर आपके ही बस का ये काम है। वाह वाह सैकड़ों दाद क़ुबूल फ़रमाइये मुमताज़ साहिबा

  2. Ham to samjhe ho gaya poora nisaab e zindagi
    saamne lekin khula hai phir naya ik baab sa
    waah waah kya kahne mohtarma Mumtaaz Naazaa’n saahiba behtareen ghazal ka behrareen sher

  3. Mumtaaz Naza sahiba hamesha ki tarah shandaar ghazal..

    hum to samjhe ho gya………. is sher par khusoosi daad!! waaaaaaah!!!

  4. मुमताज़ जी
    बहुत प्यारी ग़ज़ल हुई है। इस पर मक़्ता तो कमाल है।
    ढेरों दाद क़ुबूलें।
    सादर
    पूजा

  5. हम तो समझे हो गया पूरा निसाबे-ज़िन्दगी
    सामने लेकिन खुला है फिर नया इक बाब सा
    wah mumtaz nazan ji, kya baat hai

  6. kya hi umda ghazal hui hai mumtaaz nazaan sahiba….

    नींद में चलते रहे हैं ज़ीस्त की राहों पे हम
    वक़्त जो गुज़रा है अब तक, लग रहा है ख़्वाब सा

    kya hi umda she’r..zindabaad… aur maqta bhi behad khoob hua hai… daad qubulen…

  7. Bohot acchi gazal hai; khaas taur par makta behad pasand aaya!!

  8. Mumtaz Naz saheba, ek eik sheir ghazal ka umda hai. RAWANI AUR BARJASTAGI SE BHARPOOR KALAM. MUBARAKBAAD QUBOOL FARMAYEN.

  9. टीसता रहता है पल-पल रोज़ो-शब मेरा बदन
    ज्यूँ रगों में गर्दिशें करता हो कुछ तेज़ाब सा

    नींद में चलते रहे हैं ज़ीस्त की राहों पे हम
    वक़्त जो गुज़रा है अब तक, लग रहा है ख़्वाब सा
    Bahut achi gazal hui mumtaz ji
    dili daad hazir hai

  10. वाह वाह मुमताज़ साहिबा.. अच्छी ग़ज़ल कही है आपने दाद क़ुबूल फरमाएं।

  11. हम तो समझे हो गया पूरा निसाबे-ज़िन्दगी
    सामने लेकिन खुला है फिर नया इक बाब सा

    वाह वाह मुमताज़ जी..
    बहुत ख़ूब ग़ज़ल हुई है.
    बधाई.

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: