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T-26/5 अगरचे रंग गुल का दब रहा है-शाज़ जहानी

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिसे तरह किया गया

ग़ज़ल कहने का किसको ढब रहा है
वो रुत्बा इश्क़ का अब कब रहा है

बशाशत बर्गे-गुल में है जो इतनी
किसी के लब पर उसका लब रहा है

मुशव्वश शक्ल से उस गुल की ज़ाहिर
ये होता है कहीं वो शब रहा है

परस्तिश में ही शब आख़िर हुई है
हमारे पास वो बुत जब रहा है

तुम्हारे अहद में ऐ काफ़िरो, हय
कहाँ वो मिल्लतो-मज़हब रहा है

मिरा ज़ानू तिरे ज़ानू के नीचे
उठूँ क्यूँकर कि काफ़िर दब रहा है

इसे कब नाज़े-बुस्ताँ की हवस है
ये दिल नित कुश्ता-ए-ग़बग़ब रहा है

मु-ए जुज़ ‘मीर’ जो थे फ़न के उस्ताद
यही इक रेख़्ता-गो अब रहा है

नित उसकी “मुसहफ़ी” खाता हूँ दुश्नाम
यही तो मेरा अब मंसब रहा है

—————————

शाज़ जहानी साहब की तरही ग़ज़ल

अगरचे रंग गुल का दब रहा है
ये फिर भी आप पर क्या फब रहा है

नज़र से दूर तो बरसों से है, पर
हमेशा दिल के वो अक़रब रहा है

हुआ आरा में जब जब तफ़्रिकः तब
उसी का मशवरा अंसब रहा है

वो था, है, और होगा, शक नहीं है
ये हैरत है कि वो ग़ायब रहा है

सियासत मंदिरों में, मस्जिदों में
कहाँ वो मिल्लतो-मज़हब रहा है

रहा वो भीड़ का बस एक चेहरा
समा पर जिस तरह कौकब रहा है

वो अपने फ़न में माहिर हो गया है
ये उसका शग़ल रोज़ो-शब रहा है

ख़ुदा पर मुन्हसिर है ज़िंदगी कुछ
मुझे ख़ुद पर भरोसा कब रहा है ?

नहीं मालूम था तो बस मुक़द्दर
वगरनः इल्म में तो सब रहा है

जुदा मिल्लत में शादी आम है अब
बिरहमन तक नहीं अंजब रहा है

ज़मीं पर मैं तो वो है आसमाँ पर
जो हमपेशा-ओ-हममश्रब रहा है

फ़क़त कमज़ोर पर औ’ मुफ़्लिसों पर
जहाँ का क्यों सितम, यारब रहा है

नहीं दिन दूर, बस जायेगा ये भी
जो ख़ित्ता आज तक अख़रब रहा है

न रोके “शाज़” को पीने से कोई
वो इक मुद्दत से तश्नःलब रहा है

समझ पायें, वही कम रह गये हैं
ग़ज़ल कहने का किसमे ढब रहा है

शाज़ जहानी 09350027775

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22 comments on “T-26/5 अगरचे रंग गुल का दब रहा है-शाज़ जहानी

  1. अहा क्या ही मीठा मत्ला कहा वाह वाह

    अगरचे रंग गुल का दब रहा है
    ये फिर भी आप पर क्या फब रहा है

    • बहुत बहुत शुक्रिया तुफ़ैल साहेब. आपसे पाई हुई दाद ख़ास माना रखती है.
      शाज़

  2. Shaaz Jahaani sahab mushkil Qawaafi men UMDA matle ke saath behtareen Ghazal, MUBAARAKBAAD pesh kar raha hu’n Qabool kare’n. “Shafique Raipuri”

  3. BaDhiya Ghazal Hui h shaaz jahani SB. Daad qubul kareiN.

  4. Pooja ji aapki kawishoN ko salaam!! aisi zameen meiN aapne bahot achche ash’aar nikale haiN.. mubarakbaad!!

  5. Shah Jahani sb badhiya ghazal… waaaaaaaaaaaaah!!!

  6. bahut umda ghazal shaaz sahab…. matla aur ye she’r नहीं दिन दूर, बस जायेगा ये भी
    जो ख़ित्ता आज तक अख़रब रहा है.. khaas taur pe pasand aaye.,.. daad qubulen

  7. Shaz Sahab bohot khoobsurat gazal par dili daad kubool farmayein!!

  8. SHAZ SAHEB, BAHUT ME’YAARI GHAZAL HAI. CONGRATS

  9. Shaaz Sahab, maafi fhaahti yun, dictionary dekha to apni bhool ka ehsaas hua, aap sahi hain

  10. जनाब शाज़ जहानी साहिब… वाह वाह बहुत ख़ूब.. कमाल की ग़ज़ल कही है आपने.. शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें।

  11. Ek behad achhi Ghazal ke liye bahut bahut mubaraqbaad sahab 🙂

  12. Ghazal to bahot achhi hai lekin ek sher men aap ne aqrab ko qareeb ke maani men baandha hai jab ke qrab bichhu ko kehte hain

  13. उम्दा ग़ज़ल..दाद

  14. नहीं दिन दूर, बस जायेगा ये भी
    जो ख़ित्ता आज तक अख़रब रहा है

    वाह वाह !!
    क्या कहने शाज़ साहब !

    पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन.

    मुबारक़.

  15. Wahhhhhhh Wahhhhhhh
    Bahut achi gazal hui jahani sahab
    dili daad qubul kijiye

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