19 टिप्पणियाँ

T-26/4 तेरा रब कोई मेरा रब कोई-नाज़िम नक़वी

हज़रते-मुसहफ़ी की वो ग़ज़ल जिसे तरह किया गया

कह गया कुछ तो ज़ेरे-लब कोई
जान देता है बेसबब कोई

जावे क़ासिद उधर तो ये कहियो
राह तकता है रोज़ो-शब कोई

गो कि आंखों में अपनी आवे जान
मुंह दिखाता है हमको कब कोई

बन गया हूं मैं सूरते-दीवार
सामने आ गया है जब कोई

जबकि हमसाये उस परी के रहे
न मिला झांकने का ढब कोई

हद ख़ुश आया ये शेरे-’मीर’ मुझे
कर के लाया था मुंतख़ब कोई

अब ख़ुदा मग़फ़िरत करे उसकी
’मीर’ मरहूम था अजब कोई

ए फ़लक उसको तू ग़नीमत जान
’मुसहफ़ी’ सा नहीं है अब कोई

————————————-

नाज़िम नक़वी साहब की तरही ग़ज़ल

तेरा रब कोई मेरा रब कोई
इससे बढ़कर हो क्या ग़ज़ब कोई

कोई मज़हब नहीं है ग़म का मगर
ये कहां जानता है अब कोई

दर्द मौक़ापरस्त होता है
ढूंढ़ ही लेगा फिर सबब कोई

ये ही बेहतर है इस तरह कह दो
“जान देता है बेसबब कोई”

आंख मजमे में खो गई वरना
हम भी कर लेते मुंतख़ब कोई

चंद लम्हों का खेल है सारा
उम्र भर की नहीं तलब कोई

सब तुम्हें जानते तो हैं ‘नाज़िम’
तुमको पहचानता है कब कोई

नाज़िम नक़वी 09811400468

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19 comments on “T-26/4 तेरा रब कोई मेरा रब कोई-नाज़िम नक़वी

  1. पुराने चावल ज़ाहिर है ख़ुश्बू देंगे ही सो आपसे तो इस लहजे में सेंचुरी की तवक़्क़ो तो होती ही है। कामयाब ग़ज़ल के लिये दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  2. waaah! nazim sb!!

    dard mauqa parast hota hai.

    ye hi behtar hai is tarah keh do..

    in Ashaar par alag se daad!!

  3. उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद क़ुबूल फरमायें

  4. दर्द मौक़ापरस्त होता है
    ढूंढ़ ही लेगा फिर सबब कोई

    Behtareen Ghazal

  5. दर्द मौक़ापरस्त होता है
    ढूंढ़ ही लेगा फिर सबब कोई

    कैसा अच्छा शेर है , वाह वाह

    तमाम ग़ज़ल बेहद उम्दा है

  6. चंद लम्हों का खेल है सारा
    उम्र भर की नहीं तलब कोई

    वाह

  7. ये जो अशआर हैं , नगीने हैं
    कर के लाया है मुन्तखब कोई

    यक़ीनन बेहतरीन ग़ज़ल कही है – नाजिम नक़वी साहब !!!
    तेरा रब कोई मेरा रब कोई
    इससे बढ़कर हो क्या ग़ज़ब कोई
    ये दुनिया ईश्वर अल्लाह के भेद पर सदियों से गुमराह की जा रही है –ये ऐसा ही है जैसे इस बात पर लड़ा जाय कि चाँद और माहताब अलग अलग शय है – मतले पर दाद !!!!
    कोई मज़हब नहीं है ग़म का मगर
    ये कहां जानता है अब कोई
    दिल गया रौनके हयात गयी
    गम गया सारी काइनात गयी –जिगर
    हां लेकिन अब कौन जानता है कि गम समष्टि से जुड़ाव का एक ईश्वरीय साधन और वरदान है !!! सबके दुःख एक जैसे है लेकिन क्या किया जाय कि हिन्दू और मुसलमान का दुःख अलग अलग माना जाता है !!!
    दर्द मौक़ापरस्त होता है
    ढूंढ़ ही लेगा फिर सबब कोई
    हमारे पास ये जो दिल है न वो ही इस शिकारी की चारागाह है– रास्ते बना देता है दर्द के लिए –इसके बगैर जी नहीं पाता !!!!
    ये ही बेहतर है इस तरह कह दो
    “जान देता है बेसबब कोई”
    क्या तंज़ है !! इस सम्बोधन के पसमंज़र में महबूब भी है ज़माना भी रकीब भी और हयात भी –सभी से कहा गया है ये शेर !!!
    आंख मजमे में खो गई वरना
    हम भी कर लेते मुंतख़ब कोई
    इतनी राहे मुझे बुलाती हैं
    जुस्तजू राह भूल जाती है –मयंक
    आंख मजमें में खो गयी –इस कहन पर दाद !!!
    चंद लम्हों का खेल है सारा
    उम्र भर की नहीं तलब कोई
    तस्लीम !!!!
    सब तुम्हें जानते तो हैं ‘नाज़िम’
    तुमको पहचानता है कब कोई
    जब हमारे अलफ़ाज़ में उतर कर कोई हमें तलाश नहीं कर पाता तो कोई रूह की गहराइयो में क्या उतरेगा !! इसलिए एक शेर शिकेब का –
    बंटा सके है पड़ोसी किसी का दर्द कभी
    यही बहुत है कि चहरे से आशना है कोई—शिकेब
    नाज़िम नक़वी साहब ग़ज़ल पर भरपूर दाद !!! –मयंक

  8. poori ki poori ghazal umda hai nazim naqvi sahab kya kahne… aur ye she’r to kamal hain..

    दर्द मौक़ापरस्त होता है
    ढूंढ़ ही लेगा फिर सबब कोई

    आंख मजमे में खो गई वरना
    हम भी कर लेते मुंतख़ब कोई

    चंद लम्हों का खेल है सारा
    उम्र भर की नहीं तलब कोई
    zindabaad…. kya kahne…

  9. दर्द मौक़ापरस्त होता है
    ढूंढ़ ही लेगा फिर सबब कोई

    ये ही बेहतर है इस तरह कह दो
    “जान देता है बेसबब कोई”

    आंख मजमे में खो गई वरना
    हम भी कर लेते मुंतख़ब कोई

    वाह !!!

    क्या कहने नाज़िम साहब !
    भरपूर ग़ज़ल.
    दिली दाद क़ुबूल करें.

  10. बहुत खूब नाज़िम नक़वी साहब लाजवाब ग़ज़ल हुई है तमाम शेर क़ाबिले दाद है! मुबारकबाद क़ुबूल करें

  11. बढिया ग़ज़ल है नाज़िम साहब। बधाई।

  12. नाज़िम साहब
    क्या ही खूब ग़ज़ल हुई है।
    दाद क़ुबूल फरमायें
    सादर
    पूजा

  13. जनाब नाज़िम नक़वी साहिब,बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने ,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

  14. Behtareen gazal huyi hai Nazim Sahab; aur yeh sher kya khoob kaha hai!!
    आंख मजमे में खो गई वरना
    हम भी कर लेते मुंतख़ब कोई

  15. Behtareen Ghazal ke liye Naazim Naqvi sahab Daad haazir hai qabool kare’n

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