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T-26/3 ग़म से जीना मुहाल था,क्या था-“समर कबीर”

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस ज़मीन को तरह किया गया

ख़्वाब था या ख़याल था क्या था
हिज्र था या विसाल था क्या था

मेरे पहलू में रात जा कर दा
माह था या हिलाल था क्या था

चमकी बिजली सी पर न समझे हम
हुस्न था या जमाल था क्या था

शब जो दिल दो दो हाथ उछलता था
वज्द था या वो हाल था क्या था

जिस को हम रोज़-ए-हिज्र समझे थे
माह था या वो साल था क्या था

‘मुसहफ़ी’ शब जो चुप तू बैठा था
क्या तुझे कुछ मलाल था क्या था

—————————

समर कबीर साहब की तरही ग़ज़ल

ग़म से जीना मुहाल था,क्या था
ज़िन्दगी का सवाल था ,क्या था

मेरे ख़त का जवाब क्यूँ न दिया
वो भी ग़म से निढाल था,क्या था

सुर्ख़िऐ ख़ून-ए-दिल थी,या फिर वो
आरिज़ों पर गुलाल था,क्या था

फट गई ये ज़मीं,फटे बादल
रब का जाहो-जलाल था,क्या था

चाँद से भी हसीन था क्या वो
शाइरों का ख़याल था,क्या था

उड़ रहा था “समर” हवाओं में
मोजिज़ा था,कमाल था,क्या था ।

“समर कबीर” 09753845522

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22 comments on “T-26/3 ग़म से जीना मुहाल था,क्या था-“समर कबीर”

  1. इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद और दाद कुबूल फरमायें

  2. Samar sb shandaar nibaah kiya hai aapne radeef kawafi ke saath.. waaaaah!!

  3. Samar sb kya hi umda ghazal hui hai.. waaaaaaah!!

  4. ऐसी ज़मीन , क्या कहने, वाह वाह , बेहद अच्छी ग़ज़ल हुई है , बहुत मुबारकबाद

  5. badhiya ghazal samar kabeer sahab.. daad qubulen…

  6. मेरे खत का जवाब क्यूँ न दिया ।

    वाह वाह बहुत खूबसूरत

  7. अच्छी ग़ज़ल समीर साहब !
    बधाई.

  8. chaand se bhi haseen tha ya woh
    shayron ka khayaal tha kya tha

    kya baat hai kabeer saheb bahot achchi gjazal… Kya tha ki radewf ke saath khayaal ko nibhana nisbatan ek mushkil amal hai…

  9. समर जी, क्‍या अच्‍दा कहा है
    चाँद से भी हसीन था क्या वो
    शाइरों का ख़याल था,क्या था

    उड़ रहा था “समर” हवाओं में
    मोजिज़ा था,कमाल था,क्या था ।
    वाह।

  10. समर साहब बढिया ग़ज़ल है। रदीफ़ थोड़ा वक़्त शायद और माँग रही है। बहरहाल बहुत-बहुत बधाई।

  11. Mohtram Samar Kabeer saheb, murassa ghazal, wah, wah

  12. बहुत खूब समर कबीर साहब लाजवाब ग़ज़ल है

  13. सुर्ख़िऐ ख़ून-ए-दिल थी,या फिर
    आरिज़ों पर गुलाल था,क्या था

    Lajawab bemisal ghazal bhai…waah

  14. समर साहब
    ढेरों दाद आपके ख़ूबसूरत क़लाम के लिए।
    सादर
    पूजा

  15. Yeh Sher kya Khoob hua Samar Sahab!

    फट गई ये ज़मीं,फटे बादल
    रब का जाहो-जलाल था,क्या था

    Mubarakbad is Gazal par!!

  16. GHAZAL K LIYE DAAD-O-TAHSEEN SAMAR KABEER SAHAB

  17. भाई पूरी ग़ज़ल अच्छी है। इस बार हर ग़ज़ल बहुत बढ़िया आ रही है। लगता है हज़रते-मुसहफ़ी की दुआयें हम सबके साथ हैं। इस शेर के लिये अलग से दाद क़ुबूल फ़रमाइये

    मेरे ख़त का जवाब क्यूँ न दिया
    वो भी ग़म से निढाल था,क्या था

  18. इस ज़मीन में गज़ल कहना ही एक बहुत बडी उपलब्धि है !! और ऐसी मुरस्सा गज़ल कहना तो वाकई कमाल है !!!!
    ग़म से जीना मुहाल था,क्या था
    ज़िन्दगी का सवाल था ,क्या था
    मतले की असानी और रवानी पर दाद !!
    मेरे ख़त का जवाब क्यूँ न दिया
    वो भी ग़म से निढाल था,क्या था
    मासूम सवाल है और उमीद में लिपटे कयास का तो जवाब ही नहीं जो सानी मिसरे मे है !!!
    सुर्ख़िऐ ख़ून-ए-दिल थी,या फिर
    आरिज़ों पर गुलाल था,क्या था
    क्या कमाल का शेर कहा है !! बहुत खूब समर साहब बहुत खूब !!!!
    फट गई ये ज़मीं,फटे बादल
    रब का जाहो-जलाल था,क्या था
    यकीनन !!! इसके सिवा और कुछ नहीं !! ये हादिसे अब बहुत ज़ियादा हो भी रहे हैं !!!
    चाँद से भी हसीन था क्या वो
    शाइरों का ख़याल था,क्या था
    ऐ काकुले गेती हम तुझको किस तरह सँवारा करते हैं !!!!!
    उड़ रहा था “समर” हवाओं में
    मोजिज़ा था,कमाल था,क्या था
    तख़्ल्लुस का बेहतरीन इस्तेमाल !!!
    गज़ल की मेलोडी बहुत खूबसूरत है !!!! और एक बार फिर कहना है कि इस ज़मीन पर ग़ज़ल कहना सिर्फ माहिर फनकार के ही बूते की बात है !! समर कबीर साहब बहुत बहुत मुबारकबाद !!! –मयंक

  19. वाह मुह्तरम समर कबीर साहब कमाल की ग़ज़ल हुई है दाद ओ मुबारक़बाद कुबूल करें

  20. Waah…..waah….umdaa

  21. चाँद से भी हसीन था क्या वो
    शाइरों का ख़याल था,क्या था

    उड़ रहा था “समर” हवाओं में
    मोजिज़ा था,कमाल था,क्या था ।
    Bahut achi gazal hui saha
    dili daad qubul kijiye

  22. ग़म से जीना मुहाल था,क्या था
    ज़िन्दगी का सवाल था ,क्या था
    मेरे ख़त का जवाब क्यूँ न दिया
    वो भी ग़म से निढाल था,क्या था
    सुर्ख़िऐ ख़ून-ए-दिल थी,या फिर वो
    आरिज़ों पर गुलाल था,क्या था
    फट गई ये ज़मीं,फटे बादल
    रब का जाहो-जलाल था,क्या था
    चाँद से भी हसीन था क्या वो
    शाइरों का ख़याल था,क्या था
    उड़ रहा था “समर” हवाओं में
    मोजिज़ा था,कमाल था,क्या था ।

    समर कबीर साहेब पूरी ग़ज़ल उस्तादाना ख्याल लाज़वाब वआआह् मुबारकबाद क़बूल करे सर

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