24 टिप्पणियाँ

T-26/2 यूँ तो वीरान आसमाँ हैं हम-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

हज़रते-मुसहफ़ी की ग़ज़ल जिस ज़मीन को तरह किया गया

यादगारे-गुजि़श्‍तगां हैं हम
ख़ूब देखा तो फिर कहां हैं हम

शम्अ की तरह बज़्मे-गेती में
दाग़ बैठे हैं और रवां हैं हम

रहे जाते हैं पीछे यारों से
गर्दे-दुम्‍बाले कारवां हैं हम

रख न ख़ंजर को हाथ से क़ातिल
तेरे कुश्‍तों में नीमजां हैं हम

आबयारे-सुख़न है अपनी ज़ुबां
लफ़्ज़ो-मा’नी के बाग़बां हैं हम

तू ही तू है जो ख़ूब ग़ौर करें
एक धोका सा दर्मियां हैं हम

दावते-तेग़ के तो क़ाबिल हैं
गो कि इक मुश्ते-उस्‍तुख्‍़वां हैं हम

रंगे-रुख़ पर हमारे ज़र्दी सी
नज़र आती है क्‍या खि़ज़ां हैं हम

गो किया सर्द हम को पीरी ने
पर अभी तब्‍अ में जवां हैं हम

और भी हम को रहने दे चंदे
गो तिरी तब्‍अ पर गिरां हैं हम

‘मुसहफ़ी’ शाइरी रही है कहां
अब तो मजलिस के रोज़ाख्‍़वां हैं हम

———————————

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ की तरही ग़ज़ल

यूँ तो वीरान आसमाँ हैं हम
साथ हो तुम तो कहकशां हैं हम

वस्ल तकता है भीगी आँखों से
हिज्र पर कितने मेहरबाँ हैं हम

किस लिए चल रहा है तू अब तक
अब तिरी राह में कहाँ हैं हम

दिल में होगा तिरे क़याम अपना
शाहरग में तिरी रवां हैं हम

मर चुका है हमारा हर तारा
एक वीरान कहकशां हैं हम

उड़ते पत्तो ! हमें सताओ मत
यूँ भी लगता है रायगाँ हैं हम

तेरी यादों के बंद कमरे में
ख़ुद में घुटता हुआ धुआँ हैं हम

उसने पूछा था कहिये कैसे हैं
और तब से रवाँ-दवाँ हैं हम

बस इकत्तीस के हुए हैं अभी
उनसे कहिये अभी जवाँ हैं हम

जी बहलता है धूप ही से कुछ
वरना वीरान सायबां हैं हम

हम भी दीवार हो गए यानी
कान तो हैं प बेज़ुबां हैं हम

देखते हैं ख़ला की जानिब और
सोचते हैं ज़माँ मकाँ हैं हम

ख़ामुशी के ककून में हैं सब
जिन सदाओं के दरमियाँ हैं हम

टूटते हैं सितारे हम में रोज़
आरज़ूओं का आसमाँ हैं हम

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24 comments on “T-26/2 यूँ तो वीरान आसमाँ हैं हम-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. लाजवाब और नायाब ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद

  2. Swapnil bhai ek alag hi rang ki ghazal, fully justice with kawafi.. mubarakbaad!!

  3. स्वप्निल भाई
    आप क़माल करते हो हर बार।

    बहुत खूब। अब किस किस शेर् को चुनें।
    पूरी ग़ज़ल लाजवाब है

    बधाई

  4. अब ऐसे शेरो पर कोई कहा तक दाद दे सकता है ?

    वस्ल तकता है भीगी आँखों से
    हिज्र पर कितने मेहरबाँ हैं हम

    तेरी यादों के बंद कमरे में
    ख़ुद में घुटता हुआ धुआँ हैं हम

    उसने पूछा था कहिये कैसे हैं
    और तब से रवाँ-दवाँ हैं हम

    हम भी दीवार हो गए यानी
    कान तो हैं प बेज़ुबां हैं हम

    ————————————————————–

    देखते हैं ख़ला की जानिब और
    सोचते हैं ज़माँ मकाँ हैं हम

    और ये शेर , अहा अहा , दादा का मिसरा याद आ गया

    जिगर के टुकड़े मीरे आंसुओं में आने लगे ,

    हाय , वाह वाह वाह , कलेजा काटने वाला शेर

    ज़िंदाबाद !!!

  5. वस्ल तकता है भीगी आँखों से
    हिज्र पर कितने मेहरबाँ हैं हम

    अहा ..क्या कहने दादा ..वाह वाह
    क्या उम्दा ग़ज़ल हुई है ..ये शे’र खास तौर पर पसंद आया .. ज़िंदाबाद ..सादर

  6. क्या ही अच्छे शे’र निकाले हैं स्वप्निल भाई !

    वाह !!

    इन अशआर पर ख़ास तौर से दाद.

    उसने पूछा था कहिये कैसे हैं
    और तब से रवाँ-दवाँ हैं हम

    जी बहलता है धूप ही से कुछ
    वरना वीरान सायबां हैं हम

    हम भी दीवार हो गए यानी
    कान तो हैं प बेज़ुबां हैं हम

    देखते हैं ख़ला की जानिब और
    सोचते हैं ज़माँ मकाँ हैं हम

    और इस ट्रेडमार्क शे’र के लिये अलग से दाद.

    ख़ामुशी के ककून में हैं सब
    जिन सदाओं के दरमियाँ हैं हम

  7. स्‍वप्निल,
    इतनी दाद के बाद कुछ और कहने की गुंजाइश नहीं रहती मगर चुप रहे नहीं बनता। क्‍या ख़ूब ग़ज़ल हुई है। मरहबा। ,

  8. Kya baat hai swapnil sahab…
    वस्ल तकता है भीगी आंखों से
    हिज्र पर कितने मेहरबाँ हैं हम

    किस लिए चल रहा है तू अब तक
    अब तिरी राह में कहाँ हैं हम
    kya achche ashaar Nikale hain aapne… Wah

  9. मर चुका है हमारा हर तारा
    एक वीरान कहकशां हैं हम….Waaaaaah, aur bhi kai sher qaabil e Tehseen hain, bahot khoob

  10. Wapnil bhai, Ghazal padh kar bahut achcha laga. ek ek shei qabile daad. mubarak ho.

  11. स्वप्निल! आप तो कई ख़ूबसूरत ग़ज़लें पढवा चुके हैं मगर ये ग़ज़ल ख़ास है। ख़यालात को जिस ढब से सर किया है – देखते बनता है। जीते रहिये। अब आप से उम्मीदें और बढ गईं 😊

  12. वाह,स्वप्निल जी बहुत खूबसूरत लिखा

  13. वाहहहहहह क्या बात है जनाब

    तेरी यादों के बन्द कमरे में
    ख़ुद में घुटता हुआ धुआं है हम

    लाजवाब

  14. वस्ल तकता है भीगी आँखों से
    हिज्र पर कितने मेहरबाँ हैं हम

    तेरी यादों के बंद कमरे में
    ख़ुद में घुटता हुआ धुआँ हैं हम

    Swapnil….Jiyo Jiyo Jiyo…Aapka jawab nahin bhai…Zindabaad….

  15. जनाब आतिश जी,बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

  16. Khoob Gazal huyi Swapnil Ji! Khaas taur par yeh sher:-

    जी बहलता है धूप ही से कुछ
    वरना वीरान सायबां हैं हम

    Daad kubool karein!!

  17. Behtareen ghazal k liye mubaarakbaad Aatish sahab

  18. वैसे तो शाइर की रूह हमेशा तडपती ही रहती है –लेकिन हज़रते मुसहफ़ी साहब की रूह को ज़रूर तस्कीन मिलेगी इस गज़ल को पढ कर !!
    यूँ तो वीरान आसमाँ हैं हम
    साथ हो तुम तो कहकशां हैं हम
    आसान और बहुत सुन्दर ज़ुबान का शेर कहा है !!!! इस ख्याल को बहुत बार बाँधा गया है लेकिन इस शेर की खूबसूरती देखते बनती है !!!!
    वस्ल तकता है भीगी आँखों से
    हिज्र पर कितने मेहरबाँ हैं हम
    अह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह !! क्या बात है !! क्या बात है रेत निचोड कर दरिया निकाल लिया स्वप्निल आपने !!! वस्ल और हिज़्र पर कौन अब शेर कहेगा !! लेकिन आपने कहा और क्या खूब कहा वाह वाह !!!!
    दिल में होगा तिरे क़याम अपना
    शाहरग में तिरी रवां हैं हम
    रहे -मुहब्बत का मुसाफिर यही कहेगा !!!
    मर चुका है हमारा हर तारा
    एक वीरान कहकशां हैं हम
    नया ख्याल है नया ख्याल है इस काफिये को दूस्री बार इस्तेमाल किया है और बात है शेर में !!!
    उड़ते पत्तो ! हमें सताओ मत
    यूँ भी लगता है रायगाँ हैं हम
    मंज़र बहुत खूब है यूँ शेर से तस्वीर बनाई जाती है !! और आप तो इस के उस्ताद हैं पिक्चर पोर्ट्रेट के !!!
    तेरी यादों के बंद कमरे में
    ख़ुद में घुटता हुआ धुआँ हैं हम
    दिल जीत लिया भाई !!!! दिल जीत लिया –क्या मंजर है !! धनक है आपके पास हर लफ़्ज़ की !!!!
    उसने पूछा था कहिये कैसे हैं
    और तब से रवाँ-दवाँ हैं हम
    तुमने आकर मिजाज़ पूछ लिया //अब तबीयत कहाँ सम्भलती है !!!
    बस इकत्तीस के हुए हैं अभी
    उनसे कहिये अभी जवाँ हैं हम
    चुरा लेते हैं इस ख्याल को !!!!
    सिर्फ बावन के हम हुये हैं अभी // उनसे कहिये अभी जवाँ हैं हम—हा हा !!! स्वप्निल !! इकत्तीस में तो जवानी ही होती है??!!
    जी बहलता है धूप ही से कुछ
    वरना वीरान सायबां हैं हम
    धूप से भी और दश्त से भी क्यों ???
    देखते हैं ख़ला की जानिब और
    सोचते हैं ज़माँ मकाँ हैं हम
    कर्ज़ की पीते थे मय….. जैसा असर आया है
    टूटते हैं सितारे हम में रोज़
    आरज़ूओं का आसमाँ हैं हम
    वाह वाह वाह वाह !!!!! जो जुमला इस गज़ल की तम्हीद में कहा वो गलत नहीं है !! –मयंक

  19. किस लिए चल रहा है तू अब तक
    अब तिरी राह में कहाँ हैं हम

    दिल में होगा तिरे क़याम अपना
    शाहरग में तिरी रवां हैं हम

    मर चुका है हमारा हर तारा
    एक वीरान कहकशां हैं हम

    उड़ते पत्तो ! हमें सताओ मत
    यूँ भी लगता है रायगाँ हैं हम

    तेरी यादों के बंद कमरे में
    ख़ुद में घुटता हुआ धुआँ हैं हम
    Wahhhhhhh dada
    BAhut pyari gazal hui hai
    dili daad qubul kijiye
    SAdar

  20. प्रणाम दादा
    क्या ही खूब उपमाओं को पिरोया है आपने ग़ज़ल में।
    बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है।
    दिली दाद के साथ शुक्रिया इतने पुरअसर कहन के लिए।
    सादर
    पूजा

  21. bahut shaandaar aaghaaz
    dhamakedar ghazal hui swapnil bhai..
    mubarakbaad qubool keejiye

  22. उड़ते पत्तो ! हमें सताओ मत
    यूँ भी लगता है रायगाँ हैं हम
    तेरी यादों के बंद कमरे में
    ख़ुद में घुटता हुआ धुआँ हैं हम
    उसने पूछा था कहिये कैसे हैं
    और तब से रवाँ-दवाँ हैं हम
    बस इकत्तीस के हुए हैं अभी
    उनसे कहिये अभी जवाँ हैं हम
    जी बहलता है धूप ही से कुछ
    वरना वीरान सायबां हैं हम
    हम भी दीवार हो गए यानी
    कान तो हैं प बेज़ुबां हैं हम

    wwaah waaaaaaaaaaaaah kya kahney swapnil saheb lazawaab

  23. स्वप्निल ज़िंदाबाद, यूँ तो पूरी ग़ज़ल ही ज़बरदस्त है मगर ये शेर तो अपने ख़याल , शिल्प में इतने नये हैं कि हैरत में डाल देते हैं। सैकड़ों दाद मरहबा, मरहबा, आफ़रीं आफरीं

    वस्ल तकता है भीगी आँखों से
    हिज्र पर कितने मेहरबाँ हैं हम

    किस लिए चल रहा है तू अब तक
    अब तिरी राह में कहाँ हैं हम

    दिल में होगा तिरे क़याम अपना
    शाहरग में तिरी रवां हैं हम

    मर चुका है हमारा हर तारा
    एक वीरान कहकशां हैं हम

    उड़ते पत्तो ! हमें सताओ मत
    यूँ भी लगता है रायगाँ हैं हम

    तेरी यादों के बंद कमरे में
    ख़ुद में घुटता हुआ धुआँ हैं हम

    हम भी दीवार हो गए यानी
    कान तो हैं प बेज़ुबां हैं हम

    देखते हैं ख़ला की जानिब और
    सोचते हैं ज़माँ मकाँ हैं हम

    ख़ामुशी के ककून में हैं सब
    जिन सदाओं के दरमियाँ हैं हम

    टूटते हैं सितारे हम में रोज़
    आरज़ूओं का आसमाँ हैं हम

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