36 टिप्पणियाँ

T-26/1 कोई दम के लिये यहां हैं हम-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

हज़रते-गुलाम हमदानी साहब की वो ग़ज़ल जिसे तरह किया गया

यादगारे-गुजि़श्‍तगां हैं हम
ख़ूब देखा तो फिर कहां हैं हम

शम्अ की तरह बज़्मे-गेती में
दाग़ बैठे हैं और रवां हैं हम

रहे जाते हैं पीछे यारों से
गर्दे-दुम्‍बाले कारवां हैं हम

रख न ख़ंजर को हाथ से क़ातिल
तेरे कुश्‍तों में नीमजां हैं हम

आबयारे-सुख़न है अपनी ज़ुबां
लफ़्ज़ो-मा’नी के बाग़बां हैं हम

तू ही तू है जो ख़ूब ग़ौर करें
एक धोका सा दर्मियां हैं हम

दावते-तेग़ के तो क़ाबिल हैं
गो कि इक मुश्ते-उस्‍तुख्‍़वां हैं हम

रंगे-रुख़ पर हमारे ज़र्दी सी
नज़र आती है क्‍या खि़ज़ां हैं हम

गो किया सर्द हम को पीरी ने
पर अभी तब्‍अ में जवां हैं हम

और भी हम को रहने दे चंदे
गो तिरी तब्‍अ पर गिरां हैं हम

‘मुसहफ़ी’ शाइरी रही है कहां
अब तो मजलिस के रोज़ाख्‍़वां हैं हम

———————————————————

मनोज मित्तल ‘कैफ़’ साहब की तरही ग़ज़ल

कोई दम के लिये यहां हैं हम
आओ सुन जाओ दास्‍तां हैं हम

अपनी पस्‍ती का ख़ुद निशां हैं हम
थे कहां और अब कहां हैं हम

ऐ तख़य्युल ज़रा उड़ान दिखा
इक बुलंद और आसमां हैं हम

इश्‍क़ यूं हमसे तू गुरेज़ न कर
जां मिरी, देख तेरी जां हैं हम

ख़ार तलवों में अब नहीं चुभते
दश्‍त अब तुझमें रायगां हैं हम

fज़ंदगी क्‍त्‍ल ख्‍़वाब करवाए
तेग़ हैं तीर हैं कमां हैं हम

सगे-गेती हमें चिचोड़े है
’कैफ़’ क्‍या कोई उस्‍तुख्‍़वां हैं हम

क़तअ:-

एक पीढ़ी की हम विरासत हैं
एक पीढ़ी को सायबां हैं हम
कल कड़ी धूप का सफ़र होगा
चैन ले आज तो यहां हैं हम

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36 comments on “T-26/1 कोई दम के लिये यहां हैं हम-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

  1. Matla ta makta ek nihayat khoobsurat ghazal ke mubarakbaad!! aur shukriya aisi ghazal hum tak pahochane ke liye…

  2. बहुत उम्दा ग़ज़ल सर ..दाद क़ुबूलें
    -कान्हा

  3. सगे-गेती हमें चिचोड़े है
    ’कैफ़’ क्‍या कोई उस्‍तुख्‍़वां हैं हम

    हज़रते मुसहफ़ी के शेर से बच कर इस क़ाफ़िये पर इस से बेहतर शेर नहीं हो सकता..

    वाह !!
    क्या कहने !

    मुरस्सा ग़ज़ल के लिये दिली दाद क़ुबूल करें.

    सादर

    बकुल

  4. तुफ़ैल साहिब, बहुत शुक्रिया और शै’र की दाद भी क़ुबूल फ़रमाइये।आप हज़रते मुस्‍तफ़ी के ख़ानवादे से हैं। उनकी ज़मीनें तो आपका हक़ हैं। जसारत तो हम ऐसों की है।

  5. kya achcha sher kaha hai aapne
    ishq yun hamsw tu gurez na kar
    jaan meei dekh teri jaan hain hum
    achchi ghazal

  6. एक पीढ़ी की हम विरासत हैं
    एक पीढ़ी को सायबां हैं हम

    मनोज जी क्या बात। बहुत ख़ूब। इस झुण्डागिरी के माहौल में अच्छे लोगों की और भी ज़ियादा ज़ुरूरत है।

  7. वाहहहहहह कैफ़ साहब लाजवाब ग़ज़ल
    मुबारकबाद क़ुबूल करें

  8. जनाब कैफ़ साहिब,मुरस्सा ग़ज़ल से नवाज़ा है आपने मंच को,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल करें ।

  9. इश्क़द यूं हमसे तू गुरेज़ न कर
    जां मिरी, देख तेरी जां हैं हम
    Zinda baad Manoj Bhai…behad khoobsurat ghazal ke liye dheron daad kaboolen.

    Neeraj

  10. Kya khoob Matla kaha hai Kaif Sahab aapney!

    कोई दम के लिये यहां हैं हम
    आओ सुन जाओ दास्‍तां हैं हम

    Daad kubool karein!!!

  11. KHAAR TALWO’N ME’N AB NAHI’N CHUBHTE
    DASHT AB TUJH ME’N RAAYEGAA’N HAI’N HAM
    WAAH WAAH MITTAL SAHAB KYA KAHNE

  12. कोई दम के लिये यहां हैं हम
    आओ सुन जाओ दास्तांं हैं हम
    कुदरत की बनाई 7 अरब दास्तानो में से एक हम हैं !!!
    अपनी पस्तीन का ख़ुद निशां हैं हम
    थे कहां और अब कहां हैं हम
    किसने जलाई बस्तियाँ बाज़ार क्यों लुटे
    मैं चाँद पर गया था मुझे कुछ ख़बर नहीं –बशीर
    हम अपनी पस्ती का निशाँ खुद हैं !!! 21सवीं सदी में !!!
    ऐ तख़य्युल ज़रा उड़ान दिखा
    इक बुलंद और आसमां हैं हम
    सानी मिसरे की तर्तीब में बुलन्द के बाद और लफ़्ज़ बाधा बन रहा है –लेकिन शेर का केन्द्रीय भाव बहुत सुन्दर है एक शेर पेशे खिदमत है — बुझी न प्यास समन्दर तेरे शिनावर की
    जो खुद में डूब गया उसको काइनात मिली –मय्ंक
    इश्क़द यूं हमसे तू गुरेज़ न कर
    जां मिरी, देख तेरी जां हैं हम
    हासिले ग़ज़ल शेर है !! वैसे अभी तलक इस गज़ल का हर शेर हासिले अदब है !!!
    ख़ार तलवों में अब नहीं चुभते
    दश्त अब तुझमें रायगां हैं हम
    मुश्किलें इतनी पडी मुझपर कि आसाँ हो गयीं
    fज़ंदगी क्ल् प ख़्यवाब करवाए
    तेग़ हैं तीर हैं कमां हैं हम
    तस्लीम !!
    सगे-गेती हमें चिचोड़े है
    ’कैफ़’ क्या कोई उस्तु़ख़् वां हैं हम
    चिचोडे लफ़्ज़ पर वार जाऊँ !!!
    मित्तल साहब !!!! आपके कल्म का जवाब नहीं बहुत खूब बहुत खूब !! –मयंक

  13. क़ैफ़ साहब
    क्या कमाल ग़ज़ल हुई है।
    दिली दाद क़ुबूल कीजिये।
    सादर
    पूजा

  14. इश्‍क़ यूं हमसे तू गुरेज़ न कर
    जां मिरी, देख तेरी जां हैं हम

    kya accha sher hua hai kaif sahab…waah waah… daad qubulen…

  15. kaif sahab bahut achchi ghazal hui…
    mubarakbaad qubool farmaaiye…

  16. वाह. कमाल किया है जनाब. बहुत बढ़िया अशार।

  17. apni pasti ka khud nishaa(n) hain ham
    the kahan aur ab kahan hain ham.
    manoj Mittal ji, kya achche ashaar hain. mubarakbad qubool farmayen

  18. ऐ तख़य्युल ज़रा उड़ान दिखा
    इक बुलंद और आसमां हैं हम
    इश्क़ यूं हमसे तू गुरेज़ न कर
    जां मिरी, देख तेरी जां हैं हम
    ख़ार तलवों में अब नहीं चुभते
    दश्त अब तुझमें रायगां हैं हम
    waah manoj ji bhut khoob

  19. कैफ साहब आपकी तरही ग़ज़ल की आमद इस ख़ास महफ़िल की पुररौनक़ शुरुआत है। पूरी ग़ज़ल ही बहुत उम्दा है मगर आपका ये शेर तो कलेजा काटता है।

    इश्‍क़ यूं हमसे तू गुरेज़ न कर
    जां मिरी, देख तेरी जां हैं हम

    सैकड़ों दाद क़ुबूल फ़रमाइये। ख़ाकसार की भी इक जसारत आपकी नज़र

    इब्ने-मरियम बना फिरे है वो
    उससे कहियो कि नीमजां हैं हम

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