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T-26 तरही-26 की तरही नशिस्त में इस बार कुछ नया ढब

यूँ तो ग़ज़ल का दरबार बहुत बड़ा है और उसकी शोभा बढ़ाने का काम हज़ारों शायरों ने किया है मगर ग़ज़ल के दो सबसे बड़े नाम हज़रते-मीर तक़ी मीर और हज़रते-ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी वो पहले लोग हैं जिनसे ग़ज़ल का सार्वजनिक प्रचलन हुआ। ग़ज़ल का दिल्ली स्कूल और लखनऊ स्कूल की पुरबहार बेलें इन दोनों उस्तादों के कारण परवान चढ़ीं। हज़रते-मीर तक़ी मीर का कलाम सारा का सारा ही उपलब्ध है जबकि हज़रते-ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी का कलाम उनके कुल कहे गये कलाम की तुलना में बहुत ही कम मिलता है। हज़रते-मुसहफ़ी उर्दू के पहले उस्ताद थे और उन्होंने सैकड़ों शागिर्द बनाये थे। क़िस्मत की बदहाली देखिये कि मुहतरम अपना कलाम ज़िन्दगी करने के लिये बेचते भी थे। इन चौतरफ़ा बर्बादियों के बाद भी उनके आठ दीवान मिलते हैं जिनमें हज़ारों ग़ज़लें हैं, दसों क़सीदे हैं।

हज़रते-मुसहफ़ी के हम लोग ग़ुलामज़ादे हैं। इस बार तरह के लिये मिसरा तय करने की जगह ये क़ैद रखते हैं कि आप उन्हीं की किसी ग़ज़ल का सानी मिसरा स्वयं तरह तय कर लीजिये। इस बात का ख़याल रखियेगा कि ये आपकी पुरानी कही ग़ज़ल नहीं होनी चाहिये। हज़रते-मुसहफ़ी की 8-10 ग़ज़लें यहाँ पोस्ट भी की जा चुकी हैं। इसके सिवा ज़मीनों की तलाश लिए नेट पर kavita kosh का सहारा लिया जा सकता है। अपनी तरही ग़ज़ल भेजते समय साथ ही हज़रत की ग़ज़ल भी भेजिये। इससे दो फ़ायदे होंगे। एक तो ज़िन्दगी भर जिन्होंने शायरी के बाग़ को सींचा, उन हज़रत के कलाम तक हमारी रसाई हो जायेगी। दूसरे बड़े लोगों की चौखट पर हम छोटे लोग भी माथा नवा आएंगे। किन्हीं साहब को अगर बहर या क़ाफ़ियों को ले कर कोई उलझन हो तो मुझे फ़ोन कर लीजियेगा या tufailchaturvedi@gmail.com पर मेल भी भेजी जा सकती है। पोस्टिंग हर बार की तरह 10 तारीख़ जो इस बार अक्टूबर की होगी से करेंगे। तब तक दीगर चीज़ें पोस्ट होती रहेंगी।

उनके सबसे मशहूर शेरों में से एक शेर की राह से सरकार के क़दमों में अक़ीदत का पहला फूल और ग़ुलाम इब्ने-ग़ुलाम की बंदगी

‘मुसहफ़ी’ हम तो समझते थे कि होगा कोई ज़ख़्म
तेरे दिल में तो बड़ा काम रफ़ू का निकला

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प्यारे हर ज़ख़्म के होठों प हँसी तैर गयी
देख आते ही तिरे काम रफ़ू का निकला

‘तुफ़ैल’ चतुर्वेदी

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2 comments on “T-26 तरही-26 की तरही नशिस्त में इस बार कुछ नया ढब

  1. ये तो मज़े का तजरुबा रहेगा, फिर मैं भी कुछ कह लूँ तो हाज़िर होती हूँ

  2. https://rekhta.org/poets/mushafi-ghulam-hamdani?lang=Hi

    मुसहफ़ी साहब की ढेर सारी ग़ज़लों की लिंक।

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