3 टिप्पणियाँ

मेरे ही आस पास हो तुम भी-आलोक मिश्रा

मेरे ही आस पास हो तुम भी
इन दिनों कुछ उदास हो तुम भी

बारहा बात जीने मरने की?
एक बिखरी सी आस हो तुम भी

सीले नग़मों पे इतनी हैरत क्यों?
इस नमी से शनास हो तुम भी

मैं भी डूबा हूँ आसमानों में
ख़ाब में महवे-यास हो तुम भी

मैं हूँ टूटा सा एक पैमाना
एक ख़ाली गिलास हो तुम भी

ग़र मैं दुःख से सजा हुआ हूँ तो
रंज से ख़ुशलिबास हो तुम भी

अपनी फ़ितरत का मैं भी मारा हूँ
अपनी आदत के दास हो तुम भी

मेरी मिट्टी भी रेत की सी है
और सहरा की प्यास हो तुम भी

आलोक मिश्रा 09711744221

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About irshadkhansikandar

मैं मूलतः शायर हूँ . हाँ रोज़ी-रोटी के लिए फिल्म,धारावाहिक,म्युज़िक एल्बम में गीत लिखता हूँ

3 comments on “मेरे ही आस पास हो तुम भी-आलोक मिश्रा

  1. मैं हूँ टूटा सा एक पैमाना
    एक ख़ाली गिलास हो तुम भी

    Jiyo Alok…Is mukammal ghazal ke liye dheron daad kaboolen…har sher kamaal hai…

  2. Alok ji
    Khoob gazal hui hae. Her ashaar ek se badh kr ek hae.
    Bahut badhayi
    Sadar
    Pooja

  3. मेरे ही आस पास हो तुम भी
    इन दिनों कुछ उदास हो तुम भी
    बारहा बात जीने मरने की?
    एक बिखरी सी आस हो तुम भी
    मैं हूँ टूटा सा एक पैमाना
    एक ख़ाली गिलास हो तुम भी
    मेरी मिट्टी भी रेत की सी है
    और सहरा की प्यास हो तुम भी
    BAHUT achi gazal hui alok bhai
    dili daad qubul kijiye
    Sadar

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