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‘बकुल’ अच्छा तुम्हें लगने लगा है-बकुल देव

‘बकुल’ अच्छा तुम्हें लगने लगा है
मगर वो बावला है सरफिरा है

नये मौमम भी फीके लग रहे हैं
अजब पिछली रुतों का ज़ायका है

लबों की कोर पर ठहरा है आंसू
ये ग़म भी मुस्कुराना चाहता है

बयां कीजै भला अब किस के आगे
अगर ये ज़िन्दगी ही मुद्दअ़ा है

ज़रा सा ज़ाविया बदलो तो जानो
हमारी सम्त भी इक रास्ता है

तिरे बर्ताव में इतनी नफ़ासत !
हुआ क्या है ? बता क्या मसअ़ला है ?

मुक़म्मल हो चली तस्वीर दिन की
नदी में रंग सा बिखरा हुआ है

बदन में है लड़ाकों का क़बीला
मगर ये दिल सभी का सरग़ना है

ये कैसी आब है रू-ए-शफ़क़ पर
अंधेरी रात में क्या क्या जला है

बहुत कुछ बह गया आंखों के आगे
ये पिछली बारिशों का वाक़या है

बकुल देव 09672992110

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3 comments on “‘बकुल’ अच्छा तुम्हें लगने लगा है-बकुल देव

  1. तिरे बर्ताव में इतनी नफ़ासत !
    हुआ क्या है ? बता क्या मसअ़ला है ?

    Kya andaz-e-bayan hai…kamaal…Jiyo Bakul Bhai , bahut khoobsurat ghazal kahi hai aapne…waah.

  2. bakul bhai..poori ghazal hi kamaal hai.. daad qubulen…

  3. ‘बकुल’ अच्छा तुम्हें लगने लगा है
    मगर वो बावला है सरफिरा है

    नये मौमम भी फीके लग रहे हैं
    अजब पिछली रुतों का ज़ायका है
    Bahut achi gazal hui sir
    dili daad qubul kijiye

    regards
    Imran

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