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दिल ही को ज़माने की चमक रास न आए-इमरान हुसैन “आज़ाद”

दिल ही को ज़माने की चमक रास न आए
मैंने तो मियां इसमें कई शहर बसाए

अहसान मिरा है कि मैं बस्ती में रुका हूँ
सहरा तो मुझे आज भी आवाज़ लगाए

मैं खुद में कई रोज़ से पहुँचा ही नहीं हूँ
हालात मिरे दिल के मुझे कौन बताए

आ गर्दिशे-दौराँ तुझे ग़ज़लों में पिरोऊं
यूँ मेरे भी हिस्से में कोई काम तो आए

घर को नहीं भाती मिरी आवारा-मिज़ाजी
क्यूँ शब तू मुझे रोज़ यहाँ खींच के लाए

आ बैठ के पहलू में मिरे रात बिता दे
कब मैंने कहा मुझको तू सीने से लगाए

इस काम में कोई भी मददगार न होगा
छूना हो फ़लक जिसको, वो खुद हाथ बढ़ाए

दिल तुझसे जुदा हो के भी वीरान नहीं है
अब इसमें टहलते हैं तिरी याद के साए

कितनी ही बसें जा चुकीं, दिन कब का जगा है
जाये कोई जाकर मियाँ,सूरज को जगाए

“आज़ाद मियाँ” शायरी में ताज़गी लाओ
या चलते रहो मीर का दीवान उठाए

इमरान हुसैन “आज़ाद” 09536816624

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10 comments on “दिल ही को ज़माने की चमक रास न आए-इमरान हुसैन “आज़ाद”

  1. Imran Bhai is behtareen aur mukammal ghazal ke liye aapki jitni tareef ki jaay kam hai…hum to fan ho gaye aapke…kaayal ho gaye aapke andaaz-e-bayan ke…waah waah…kya kahne hain …Jiyo.

  2. इमरान भाई ख़ूब सुन्दर अश्आर पिरोये हैं आपने।
    दिली दाद
    पूजा

  3. Wah Imran miyan, khoob taraqqi karo

  4. Bahut achche imran aapki mehnat rang laa rahi hai…mubarakbaad

  5. दिल तुझसे जुदा हो के भी वीरान नहीं है
    अब इसमें टहलते हैं तिरी याद के साए

    क्या कहने इमरान भाई !
    बहुत अच्छी ग़ज़ल !

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