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T-25/34 जब ध्यान उसके हुस्नो-अदा में लगा रहा-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

जब ध्यान उसके हुस्नो-अदा में लगा रहा
ऐसा हुआ ख़याल ख़ुदा में लगा रहा

जाना है अब ये इश्क़ तो पत्थर था रेत का
मैं मुफ़्त ही तराशो-जिला में लगा रहा

मुज़्तर हुई जो रूह तो आज़ाद हो गयी
और चारासाज़ नब्ज़ो-दवा में लगा रहा

आवाज़ के जहान में ये उम्र कट गयी
रिश्तों के साथ सौतो-सदा में लगा रहा

चारों तरफ़ था वो प कभी दिख नहीं सका
बस इत्र सा क़बा-ए-हवा में लगा रहा

तख़्ते-शही था उसका बहुत मुन्तज़िर मगर
वो उम्र भर तलाशे-हुमा में लगा रहा

जुरअतपिज़ीर थे जो ज़माना बदल गए
मैं तो हिसाबे-जुर्मो-सज़ा में लगा रहा

मैं ही नहीं था रात का शैदाई हिज्र में
ख़ुर्शीद भी ख़याले-इशा में लगा रहा

हू-हा थी ख़ाहिशों की मुग़ीलां ख़याल थे
दिल हौलनाक दश्ते-बला में लगा रहा

दिल रूसियाह ‘कैफ़’ की पहचान हो गया
मानिन्दे-दाग़ तन की रिदा में लगा रहा

मनोज मित्तल ‘कैफ़’ 09887099295

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2 comments on “T-25/34 जब ध्यान उसके हुस्नो-अदा में लगा रहा-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

  1. Manoj Bhai samajh nahin paa raha aapki is ghazal ki tareef kin lafzon men karun ? Kamaal ka kalaam hai…aap genius hain janab…waah waah waah…

  2. जब ध्यान उसके हुस्नो-अदा में लगा रहा
    ऐसा हुआ ख़याल ख़ुदा में लगा रहा
    वाह वाह !! –जान तुम पर निसार करता हूँ //मैं नहीं जानता दुआ क्या है –ग़ालिब !!
    जाना है अब ये इश्क़ तो पत्थर था रेत का
    मैं मुफ़्त ही तराशो-जिला में लगा रहा
    तराश्ने में ज़वाइद पत्थर से निकल जाता है लेकिन यहाँ !!!! वाह वाह मित्तल साहब !! क्या बात है बहुत खूब क्या मंज़र्कशी है !!!
    मुज़्तर हुई जो रूह तो आज़ाद हो गयी
    और चारासाज़ नब्ज़ो-दवा में लगा रहा
    अब इस मर्ज़ के बारे में between the lines कह दिया है आपने शेर में वही पस्मंज़र शेर की रूह है !!!
    आवाज़ के जहान में ये उम्र कट गयी
    रिश्तों के साथ सौतो-सदा में लगा रहा
    बेशतर ज़िन्दगी तो सच यही है कि अल्फाज़ की असीरी और अल्फाज़ से जद्दोजह्द में ही बीत जाती है और वो भी अपने दायरे में यानी अपने रिश्तों में !!!! शेर पर दाद !!
    चारों तरफ़ था वो प कभी दिख नहीं सका
    बस इत्र सा क़बा-ए-हवा में लगा रहा
    हाँ उसे महसूस किया जाता है – खुदा ऐसे इर्फान का नाम है //रहे सामने और दिखाई न दे –बशीर –लेकिन जो सिमिली है यहाँ सानी मिसरे में बडी मोहक है !!!
    तख़्ते-शही था उसका बहुत मुन्तज़िर मगर
    वो उम्र भर तलाशे-हुमा में लगा रहा
    बैजू बावरा ने अपना मंसब खो दिया वो भी खुद की मर्ज़ी से और दरबार का तमगा तानसेन को मिला क्योकि जो बात शेर में कही गई है वह उसके तहत भी सच थी !!!
    जुरअतपिज़ीर थे जो ज़माना बदल गए
    मैं तो हिसाबे-जुर्मो-सज़ा में लगा रहा
    क़ैफ़ साहब !!! अब शराफत को कम्ज़ोरी समझा जाता है थोडा खुदसर होना बेबात भी आज मेरिट है –इससे काम बनते हैं दाम भी !!
    मैं ही नहीं था रात का शैदाई हिज्र में
    ख़ुर्शीद भी ख़याले-इशा में लगा रहा
    वाह वाह वाह वाह !! क्य बात है दाद दाद !!!!
    हू-हा थी ख़ाहिशों की मुग़ीलां ख़याल थे
    दिल हौलनाक दश्ते-बला में लगा रहा
    इस शेर की ध्व्न्यनुसारिता और मंज़रकशी को दाद !!!
    दिल रूसियाह ‘कैफ़’ की पहचान हो गया
    मानिन्दे-दाग़ तन की रिदा में लगा रहा
    कोई नामो निशाँ पूछे , तो ऐ क़ासिद बता देना
    तख़ल्लुस दाग़ है और आशिकों के दिल में रहते हैं –मिर्ज़ा दाग़ देहलवी
    मनोज मित्तल ‘कैफ़’ साहब !!ये इस नशिस्त की वो गज़ल है जो बेशक अदब की भी ज़ीनत है !!! बहुत बहुत मुबारकबाद !!! –मयंक

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