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T-25/33 अच्छाइयों का दाग़ ख़ता में लगा रहा-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

अच्छाइयों का दाग़ ख़ता में लगा रहा
घर का ख़याल साथ सज़ा में लगा रहा

आँखों के ज़ख्म दिन के उजालों के थे निशाँ
शब भर तुम्हारा ख्व़ाब दवा में लगा रहा

किस लफ़्ज़ से विसाल की थी उसको आरज़ू
सन्नाटा कैसी आहो-बुका में लगा रहा

इक मैं और एक वो थे जहां में बचे हुए
‘मैं उसके साथ साथ दुआ में लगा रहा’

आँखों से अब्र छंट गये पर उसके बाद फिर
तू, इक धनक-ख़याल फ़ज़ा में लगा रहा

बरगद ज़मीं के ख़ाब में जामिद रहा मगर
मिटटी का ध्यान उसकी जटा में लगा रहा

सहमे दियों ने कान पे रक्खे हुए थे हाथ
फिर भी मैं दास्ताने-हवा में लगा रहा

वो शामे-रायगाँ थी कि रीझा नहीं कोई
रात अपनी और दिन अपनी अदा में लगा रहा

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ 08879464730

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12 comments on “T-25/33 अच्छाइयों का दाग़ ख़ता में लगा रहा-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. Waaaaaah kya kehne, badi faseeh urdu istemaal kartehain janaab, bahot khoob

  2. अच्छाइयों का दाग़ ख़ता में लगा रहा
    घर का ख़याल साथ सज़ा में लगा रहा
    ऊला मिसरा बहुत अच्छा है –लेकिन स्वप्निल इस बार मतले में सम्प्रेषणीयता की कमी महसूस हुई !!!
    आँखों के ज़ख्म दिन के उजालों के थे निशाँ
    शब भर तुम्हारा ख्व़ाब दवा में लगा रहा
    इस शेर पर दाद दाद दाद !! ऊला मिसरा क्या बेहतरीन कहा है और शेर भी बहुत सुन्दर कहा है !!!
    किस लफ़्ज़ से विसाल की थी उसको आरज़ू
    सन्नाटा कैसी आहो-बुका में लगा रहा
    इस शेर पर भी दाद !! अब एक चीज़ काबिले गौर ये भी है कि बेहद जटिल विचरों को भी आपकी भाषा सुलझा कर कंवे कर देती है य्ही हुनर य्ही शीशागरी बार बार मुन्ह से वाह निकलवाती है !!! बहुत ही अच्छा शेर है ये !!!
    आँखों से अब्र छंट गये पर उसके बाद फिर
    तू, इक धनक-ख़याल फ़ज़ा में लगा रहा
    वह और इसी तस्वीरी सिफत के लिये ज़माना आपका मुरीद है !!
    बरगद ज़मीं के ख़ाब में जामिद रहा मगर
    मिटटी का ध्यान उसकी जटा में लगा रहा
    इस शिल्प में सिम्बल्स कुछ कह रहे हैं –जिसे मैं पढ नहीं सका !!!!
    सहमे दियों ने कान पे रक्खे हुए थे हाथ
    फिर भी मैं दास्ताने-हवा में लगा रहा
    हासिले ग़ज़ल शेर यही है और इस तरही के सबसे अच्छे 1-2 शेरों में है !!!
    स्वप्निल इधर आपकी आमद कम है सब ठीक तो है न ??!! सस्नेह –मयंक

    • pranam bhaiya… she’ron ko dubara jhaadne ponchne ki koshish karunga ki kuch saaf ho saken… bas aaj kal padhne likhne ka zahn nahi ban paa raha hai… aur doosri masroofiyat bhi kuch badhi hui hain… bahut bahut shukriya aapka….

  3. bahut umda der aayad durust aayad…
    बरगद ज़मीं के ख़ाब में जामिद रहा मगर
    मिटटी का ध्यान उसकी जटा में लगा रहा

    सहमे दियों ने कान पे रक्खे हुए थे हाथ
    फिर भी मैं दास्ताने-हवा में लगा रहा

    वो शामे-रायगाँ थी कि रीझा नहीं कोई
    रात अपनी और दिन अपनी अदा में लगा रहा
    mubarakbaad swapnil bhai

  4. आँखों से अब्र छंट गये पर उसके बाद फिर
    तू, इक धनक-ख़याल फ़ज़ा में लगा रहा

    सहमे दियों ने कान पे रक्खे हुए थे हाथ
    फिर भी मैं दास्ताने-हवा में लगा रहा

    वो शामे-रायगाँ थी कि रीझा नहीं कोई
    रात अपनी और दिन अपनी अदा में लगा रहा

    ख़ूबसूरत ग़ज़ल स्वप्निल भाई..
    दिली दाद क़ुबूल करें.

  5. वाह वाह क्या कहने स्वप्निल जी क्या बात है एक से बढ़कर एक शेर सभी लाजवाब मुबारक हो आपको बहुत बहुत शुभकामनाये इक मैं और एक वो थे जहां में बचे हुए
    ‘मैं उसके साथ साथ दुआ में लगा रहा’
    आँखों से अब्र छंट गये पर उसके बाद फिर
    तू, इक धनक-ख़याल फ़ज़ा में लगा रहा
    बरगद ज़मीं के ख़ाब में जामिद रहा मगर
    मिटटी का ध्यान उसकी जटा में लगा रहा
    सहमे दियों ने कान पे रक्खे हुए थे हाथ
    फिर भी मैं दास्ताने-हवा में लगा रहा
    वो शामे-रायगाँ थी कि रीझा नहीं कोई
    रात अपनी और दिन अपनी अदा में लगा रहा waah

  6. किस लफ़्ज़ से विसाल की थी उसको आरज़ू
    सन्नाटा कैसी आहो-बुका में लगा रहा

    इक मैं और एक वो थे जहां में बचे हुए
    ‘मैं उसके साथ साथ दुआ में लगा रहा’

    आँखों से अब्र छंट गये पर उसके बाद फिर
    तू, इक धनक-ख़याल फ़ज़ा में लगा रहा

    बरगद ज़मीं के ख़ाब में जामिद रहा मगर
    मिटटी का ध्यान उसकी जटा में लगा रहा
    Bahut pyari gazal dada
    dili daad qubul kijiye
    sadar
    Imran

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