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T25/27 क्या ख़ूब, सर तो हुक्मे-ख़ुदा में लगा रहा-शफ़ीक़ रायपुरी

क्या ख़ूब, सर तो हुक्मे-ख़ुदा में लगा रहा
कमबख़्त दिल बुतों की रज़ा में लगा रहा

दुनिया मुझे मिटने की धुन में लगी रही
मैं इत्तिबा-ए-अहले-वफ़ा में लगा रहा

क़दमों पे उनके इश्क़ ने सर रख दिया उधर
ज़ाहिद इधर सज़ा-ओ-जज़ा में लगा रहा

रंजो-अलम की धूप बरसती रही मगर
दिल था कि फिर भी शुक्रे-ख़ुदा में लगा रहा

लालच बुरी बला है ये सब जानते हुए
इंसान था कि हिर्सो-हवा में लगा रहा

करता रहा जफ़ा पे जफ़ा वो जफ़ाशिआर
मैं फिर भी उसके साथ वफ़ा में लगा रहा

वाइज़ ने ऐसा ज़िक्रे-जहन्नम किया कि बस
घबरा के बुत भी यादे-ख़ुदा में लगा रहा

फिर आएंगे वो मेरी अयादत के वास्ते
इस वास्ते मैं तर्के-दवा में लगा रहा

तेरा तो ऐ ‘शफ़ीक़’ बिखरना था लाज़मी
क्यों जुस्तजू-ए-अहले-वफ़ा में लगा रहा

शफ़ीक़ रायपुरी 09406078694

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9 comments on “T25/27 क्या ख़ूब, सर तो हुक्मे-ख़ुदा में लगा रहा-शफ़ीक़ रायपुरी

  1. क्या ख़ूब, सर तो हुक्मे-ख़ुदा में लगा रहा
    कमबख़्त दिल बुतों की रज़ा में लगा रहा
    वाह !! मुसलमान होना इतना आसान नहीं जितना समझ लिया गया है !! सर भी हुक़्मे ख़ुदा में लगे और दिल भी हम्दो सना में लगे –दोनो पाबन्दियाँ मिल कर मुसलमान बनाती हैं !!
    दुनिया मुझे मिटने की धुन में लगी रही
    मैं इत्तिबा-ए-अहले-वफ़ा में लगा रहा
    अच्छा शेर है और ऐसे लोगों के चलते दुनिया भी चल रही है !!!
    क़दमों पे उनके इश्क़ ने सर रख दिया उधर
    ज़ाहिद इधर सज़ा-ओ-जज़ा में लगा रहा
    दोनो अपना अपना काम कर रहे हैं !! इश्क वाले अपना ज़ाहिद अपना !! हिसाब बराबर !!
    रंजो-अलम की धूप बरसती रही मगर
    दिल था कि फिर भी शुक्रे-ख़ुदा में लगा रहा
    असरदार बात है !! यही जज़्बा मोमिन बनाता है !!!
    लालच बुरी बला है ये सब जानते हुए
    इंसान था कि हिर्सो-हवा में लगा रहा
    कलियुग है !! चलता है ये सब !!
    करता रहा जफ़ा पे जफ़ा वो जफ़ाशिआर
    मैं फिर भी उसके साथ वफ़ा में लगा रहा
    वो ज़िन्दगी थी इसलिये हमने निभा दिया
    उस बेवफा का संग वफाओं के साथ –साथ ***
    वाइज़ ने ऐसा ज़िक्रे-जहन्नम किया कि बस
    घबरा के बुत भी यादे-ख़ुदा में लगा रहा
    किस पौराणिक कथा का सन्दर्भ लिया है स्पष्ट करें !! मंज़रकशी तश्रीह भी चाहती है !!??
    फिर आएंगे वो मेरी अयादत के वास्ते
    इस वास्ते मैं तर्के-दवा में लगा रहा
    वाह !!!
    मुम्किन है किसी रोज़ अयादत के बहाने
    बीमार से मिलने कोई बीमार भी आये
    तेरा तो ऐ ‘शफ़ीक़’ बिखरना था लाज़मी
    क्यों जुस्तजू-ए-अहले-वफ़ा में लगा रहा
    हरचन्द राख हो के बिखरना है राह में
    जलते हुये परों से उडा हूँ मुझे भी देख –शिकेब जलाली
    शफ़ीक़ रायपुरी साहब !!! काफी इंतज़ार के बाद आपकी ग़ज़ल पधने को मिली !! बहुत बहुत मुबारक !!—मयंक

  2. Shafiq Saheb bahut behtareen gazal hai .. dili daad qubul farmaye .. is sher par khas daad pesh karta hoon ..
    वाइज़ ने ऐसा ज़िक्रे-जहन्नम किया कि बस
    घबरा के बुत भी यादे-ख़ुदा में लगा रहा
    Saify – Raipur

  3. Bahut achi gazal hui sir
    dili daad qubul kijiye
    regards
    IMran

  4. Shafique saheb, kya kamal ki ghazal hui hai. padhkar bahut achcha laga. Daad qubool farmayen. LALACH BURI BALA HAI YE SAB JANTE HUE
    INSAN THA KE HIRSO HAWA MEN LAGA RAHA……………WAH…WAH

  5. Shafique saheb, kya kamal ki ghazal hui hai. padhkar bahut achcha laga. Daad qubool farmayen. LALACH BURI BALA HAI YE SAB JANTE HUE
    INSAN THA KE HIRSO HAWAS MEN LAGA RAHA……………WAH…WAH

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