13 टिप्पणियाँ

T-25/21 हर्फ़े फ़ना था लफ़्ज़े-बक़ा में लगा रहा- बकुल देव

हर्फ़े फ़ना था लफ़्ज़े-बक़ा में लगा रहा.
‘मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा’

ताउम्र इस अज़ीम ख़ता में लगा रहा
मैं बा-वजूदे-ख़ल्क़ ख़ुदा में लगा रहा

वो ग़ुल हथेलियों प खिलाती चली गयी
क्या रंग था जो पा-ए-हिना में लगा रहा

शक्लें हज़ार सामने आईं चली गईं
आईना आइने की अदा में लगा रहा

ठंडे सफ़ेद शाल में लिपटी रही ज़मीं
इक दाग़ आसमां की रिदा में लगा रहा

वो तार जिस से ज़ख़्म किये जाने थे रफ़ू
ख़ौफ़े-बरहनगी से क़बा में लगा रहा

थी कब ज़मीं में ताब कि उसको संभालती
तुख़्मे-ज़िया था वो सो ख़ला में लगा रहा

रोते रहे लहू प पुकारा ख़ुदा ख़ुदा
अपना ज़ियां भी उसके ग़ना में लगा रहा

जो घाव था बदन प वो आख़िर को भर गया
इक तीर था जो नफ़्से-अना में लगा रहा

मरज़े-हलाले-ज़िन्दगी जाना न था मगर
आबे-हराम क़ारे-शिफ़ा में लगा रहा

इक ख़ामुशी के दश्त में आवाज़ खो गयी
मैं अब्रे-मुख़्तसर था सना में लगा रहा

अपनी ही धुन में खोये रहे सब तमाम उम्र
आलम तमाम अपनी लिक़ा में लगा रहा

वो भी हिसार तोड़ न पाया सुक़ूत का
ख़द्शा मिरी भी सौत ओ सदा में लगा रहा

हैरतज़दा हैं लोग मिरा हाल देख कर
क्या इश्क़ था जो अर्ज़े-वफ़ा में लगा रहा

मंसूब उस दिये से सहर है जो रात भर
बेख़ौफ़ इम्तिहाने-हवा में लगा रहा

बाहर के हर महाज़ से मुंह फेर कर बकुल
भीतर ये कौन था जो ग़िज़ा में लगा रहा

बकुल देव 09672992110

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13 comments on “T-25/21 हर्फ़े फ़ना था लफ़्ज़े-बक़ा में लगा रहा- बकुल देव

  1. Waaaaaah Waaaaaah Waaaaaah, kya kya haseen sher nikaale hain janaab, mazaa aa gaya

  2. वो ग़ुल हथेलियों प खिलाती चली गयी
    क्या रंग था जो पा-ए-हिना में लगा रहा
    शक्लें हज़ार सामने आईं चली गईं
    आईना आइने की अदा में लगा रहा

    ठंडे सफ़ेद शाल में लिपटी रही ज़मीं
    इक दाग़ आसमां की रिदा में लगा रहा

    वो तार जिस से ज़ख़्म किये जाने थे रफ़ू
    ख़ौफ़े-बरहनगी से क़बा में लगा रहा
    waaab 16 sher sab khoob bakul dev ji dili dad shubhkaamnaayein

  3. Bakul Bhai….jab se aapki ghazal Ayi hai main safar me hi hu…tasalli se comment karne ka jee tha magar mobile par possible nahi hai…

    Sirf itna kahunga bhai…zindabaad..bharpoor ghazal hui hai

  4. वो ग़ुल हथेलियों प खिलाती चली गयी
    क्या रंग था जो पा-ए-हिना में लगा रहा

    शक्लें हज़ार सामने आईं चली गईं
    आईना आइने की अदा में लगा रहा

    थी कब ज़मीं में ताब कि उसको संभालती
    तुख़्मे-ज़िया था वो सो ख़ला में लगा रहा

    zinadaab bakul bhai..kya acche sher hue hain.. ye teen bataure khaas pasand aaye..daad qubulen

  5. बकुल साहब बेहतरीन ग़ज़ल ख़ास कर ये शेर तो कमाल का है।
    शकलें हज़ार सामने आईं चली गईं
    आईना आइने की अदा में लगा रहा
    वाह वाह, क्या कहने ढेर सारी बधाईयाँ

  6. हर्फ़े फ़ना था लफ़्ज़े-बक़ा में लगा रहा.
    ‘मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा’

    ज़रूर हर्फ़े –गलत था मैं ज़िन्दगी तुझपर
    वगर्ना लिख के मुझे इस तरह मिटाती क्यूँ –मयंक

    बकुल भाई !! क्या बात है !!! यही तो यक्ष युधिष्ठिर प्रश्न है कि हम क्षणभंगुर हैं इसलिये सारी ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी की दुआ माँगने में बीत जाती है !!!

    ताउम्र इस अज़ीम ख़ता में लगा रहा.
    मैं बा-वजूदे-ख़ल्क़ ख़ुदा में लगा रहा.
    इस शेर पर दाद !!!
    जब तलक ये ख़ाक उसके नूर से लबरेज़ है
    तब तलक इस ख़ाक़ को उस ख़ाक से परहेज है

    वो ग़ुल हथेलियों प खिलाती चली गयी
    क्या रंग था जो पा-ए-हिना में लगा रहा
    कमल है कमाल है क्या कहन है तेसरे शेर के साथ ही इस ग़ज़ल का जादू सर पर चढ गया है !!! बहुत खूब इस शेर पर दाद !!! दाद !! दाद !!
    शक्लें हज़ार सामने आईं चली गईं
    आईना आइने की अदा में लगा रहा
    येस आइना वही रहता है चेहरे बदल जाते हैं !!! लेकिन किस खूब शायराना अन्दाज़ में ये बात कही है !! फिर दाद !!

    ठंडे सफ़ेद शाल में लिपटी रही ज़मीं
    इक दाग़ आसमां की रिदा में लगा रहा
    एक शेर शिकेब का सिल्सिला बनाये रखने के लिये — शबे सफर थी क़बा तीरग़ी की ओढे हुये
    कहीं कहीं पे मगर रोशनी का धब्बा था – शिकेब जलाली
    आसमाँ के दाग़ !! आसमाँ के ज़ख़्म !! रोशनी के धब्बे इसके पहले शैरी की तर्बीयत में शुमार नहीं थे !!

    वो तार जिस से ज़ख़्म किये जाने थे रफ़ू
    ख़ौफ़े-बरहनगी से क़बा में लगा रहा
    क्या बात है !!! peer pressure !! का concept बखूबी पहनाया है ख्याल को !! लेकिन इज़हार और कुव्वते गोयाई पर दाद दाद !!
    थी कब ज़मीं में ताब कि उसको संभालती
    तुख़्मे-ज़िया था वो सो ख़ला में लगा रहा.
    इस शेर की तश्रीह में लिखियेगा कि तुख़्मे ज़िया –सितारों के लिये है सूरज के लिये है चाँद के लिये है या इश्तियारा कुछ नितांत भिन्न बात कह रहा है ??!! मेरा तस्व्वुर तलाश कर नहीं पा रहा है !!
    रोते रहे लहू प पुकारा ख़ुदा ख़ुदा
    अपना ज़ियां भी उसके ग़ना में लगा रहा
    बडी नैसर्गिक बात है हर आह और हर इल्म की इंतेहा तो परमात्मा ही है –इसलिये अपना ज़ियां भी उसके ग़ना .. –लेकिन सच कहा गया है जहाँ न पहुंचे रवि वहाँ पहुंचे कवि … तस्व्वुर की इस उdaanइस शेर की गढन और शिल्प देखते बनता है !!!
    जो घाव था बदन प वो आख़िर को भर गया
    इक तीर था जो नफ़्से-अना में लगा रहा

    मैं कैसे दिखाऊँ कि वो लफ़्ज़ों से बना है
    इक तीर जो इस सीना ए बिस्मिल में छुपा है –मयंक

    मरज़े-हलाले-ज़िन्दगी जाना न था मगर
    आबे-हराम क़ारे-शिफ़ा में लगा रहा
    इस शेर का अर्थ भी आपको खोलना पडेगा !!! मुझे लफ़्ज़ तो स्पष्ट हैं लेकिन अर्थ स्पष्ट नहीं हो पा रहे !!
    इक ख़ामुशी के दश्त में आवाज़ खो गयी
    मैं अब्रे-मुख़्तसर था सना में लगा रहा
    मैं तिशनगी के शहर पे टुकडा हूँ अब्र का
    कोई गिला नहीं कि समन्दर नहीं हूँ मैं –मयंक

    हैरतज़दा हैं लोग मिरा हाल देख कर
    क्या इश्क़ था जो अर्ज़े-वफ़ा में लगा रहा
    इस जज़्बे के लिये आपको बधाई !! अब आप हँस सकते हैंक्योंकि या तो दीवाना हंसे या तू जिसे taufeeq दे .. तो मरतबा आपने हासिल कर लिया अर्ज़े वफा के हवाले से !!!
    मंसूब उस दिये से सहर है जो रात भर
    बेख़ौफ़ इम्तिहाने-हवा में लगा रहा
    हाँ और वाह !!!
    बाहर के हर महाज़ से मुंह फेर कर बकुल
    भीतर ये कौन था जो ग़िज़ा में लगा रहा
    ये हमारा ही पराजित आत्म्बोध है और कुछ नहीं !!
    भाई बकुल देव !! इस ज़मीन को सर आपने ही किया है !! you have left no stone unturned !!! किसी तरही ज़मीन को इस ख़ूबी से निभाना !!!! इसके लिये जोश ज़िद जवानी के सिवा कुव्वते गोयाई भी चाहिये !! कोई शक नहीं इस गज़ल ने सब कुछ कह दिया इस ज़मीन के बारे मे भी आपके बारे मे भी !! वाह वाह !! ये कलम आगे क्या क्या करेगा !!!! ???? सोच कर ही रोमांच होता है !! बहुत बहुत बधाई –मयंक

    • मरज़े हलाले ज़िन्दगी जाना न था मगर,
      आबे हराम क़ारे-शिफ़ा में लगा रहा.

      मयंक भाई,
      आपने पूछा है…मैं कोशिश करता हूं.
      ज़िन्दगी एक रोग है…लेकिन ये रोग हलाल है…हलाल इस कारण से क्यूं कि ईश्वर ने ही दिया है.
      अब इस रोग के लिये ‘शिफ़ा’ या तो मृत्यु हो सकती है या समाधि की अवस्था..
      ‘आबे हराम’ से मुराद अपनी ज़ात से ही है..

      • बकुल भाई !! आपके कलम से तश्रीह ज़रूरी थी क्योंकि रम्ज़ियत की गहराई को अन्यथा मस्लहत से मंसूब किया जाता है !! आपकी सुखन गोई अव्वल दर्ज़े की है !! मैं बहुत खुश्किस्मत हूँ कि मैने अपने समय में –अभिषेक शुक्ला – स्वप्निल तिवारी – और बकुल देव जैसे शाइरों के कलाम को पढा है !! अगली नस्लों के लिये नज़ीर मेरे पास आज की तारीख़ में है !! –मयंक

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