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T-25/22 शैदा वफ़ा का जो था, वफ़ा में लगा रहा-उत्कर्ष ‘ग़ाफ़िल’

शैदा वफ़ा का जो था, वफ़ा में लगा रहा
जिसकी रविश दग़ा थी, दग़ा में लगा रहा

उसके बदन की बास अभी पैरहन में है
बरसों पुराना इत्र क़बा में लगा रहा

इसका कोई इलाज नहीं है ख़बर न थी
नाहक़ मैं दर्दे-दिल की दवा में लगा रहा

मंदिरमें गूंजते हुएशंखों के दरमियान
‘मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा’

उसको हुकूमतों से कुल एज़ाज़ मिल गए
मैं आइने की हम्दो-सना में लगा रहा

‘ग़ाफ़िल’ मेरा वुजूद वही मुश्ते-ख़ाक है
ये सच भुला के मैं भी ख़ता में लगा रहा

उत्कर्ष ‘ग़ाफ़िल’ 09810735253

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12 comments on “T-25/22 शैदा वफ़ा का जो था, वफ़ा में लगा रहा-उत्कर्ष ‘ग़ाफ़िल’

  1. इसका कोई इलाज नहीं है ख़बर न थी
    नाहक़ मैं दर्दे-दिल की दवा में लगा रहा

    उत्कर्ष भाई..
    बहुत ख़ूब !
    अच्छी ग़ज़ल के लिये मुबारक़ !

  2. Utkarshji……Bahut achhi ghazal hui hai….waah waah 🙂

  3. Achche ashaar padhne ko mile, Wah

  4. Shukriyah bhai swapnil tiwari ji…mamnoon hoon!

  5. bhai kya hi acchi ghazal hui hai.. kaisi ravaan davaan zubaan ke saath… bahut mubarak

  6. शुक्रगुज़ार हूँ इमरान हुसैन आजाद साहब…

  7. Bahut achi gazal hui utkarsh sahab
    dili daad qubul kijiye

  8. शफीक़ साहब इनायत

  9. मयंक भाई ,बहुत-बहुत शुक्रिया !आपने बड़े सलीक़े से मेरे हर शेर की वज़ाहत पेश फ़रमाई है …मैं आईने की हम्दो-सना में लगा रहने से यहाँ मेरी मुराद अपनी तख़लीक़े-शाइरी को बज़ाते-ख़ुद सबसे बेहतर माने रखने का भरम पाले रखने से है और किसी वज़ीरो-अमीर के हुज़ूर में सर न झुकाने का ख़मियाज़ा भी मुसलसल खुद्सिताई के सबब
    भुगतते रहने से है …Shukriyah.

  10. वफ़ा का जो था, वफ़ा में लगा रहा
    जिसकी रविश दग़ा थी, दग़ा में लगा रहा

    भाई उत्कर्ष !! ये ज़बान हमें भी सिखा दो !! कितना रवाँ मतला है !! दोनो मिसरे मुकम्मल और बेहतरीन शेर !!

    उसके बदन की बास अभी पैरहन में है
    बरसों पुराना इत्र क़बा में लगा रहा
    कबा ने शाइर का वर्तमान भी बताया है कि आज वो फकीरी ले कर ज़िन्दगी बसर कर रहा है और इसका कारण भी वही है जिसके बदन की बास अभी पैरहन मे है !!

    मंदिर में गूंजते हुए शंखों के दरमियान
    ‘मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा’
    सुलहेकुल कौमी यक़्ज़हती से ऊपर एक स्वर मुहब्बत का भी है !! इसकी बानगी मे है शेर मे दो विपरीत धर्मिक ध्रुवो के बीच की मुहब्बत के इम्कान और उसके खामोश परवाज् की !!

    उसको हुकूमतों से कुल एज़ाज़ मिल गए
    मैं आइने की हम्दो-सना में लगा रहा
    उसको हुकूमतों से कुल एज़ाज़ मिल गए—कोई जिसे सत्ता से लाभ मिल गये और मैं सच की परस्तिश करता रहा एक तो ये भाव है शेर मे दूसरा जब उसको –आइने के तईं है तब शेर का अर्थ आइने के प्रचलित अर्थो से थोडा भिन्न है !! इसका केन्द्रीय भाव उत्कर्ष भाई अपने जवाब मे लिखिये !!
    ‘ग़ाफ़िल’ मेरा वुजूद वही मुश्ते-ख़ाक है
    ये सच भुला के मैं भी ख़ता में लगा रहा
    आदमी इसी को भूल कर खुल्द से खदेड कर ज़मीन पर भेजा गया !! ये ख़ता हमारा इंतिख़ाब भी है इख्तियार भी –गो कि अंजाम सब जानते हैं !!
    बहर्कैफ़ –गज़ल बहुत पसन्द आई !! बधाई उत्कर्ष भाई –मयंक

  11. Utkarsh Ghafil sahab 6 ash’aar par mushtamal umda Ghazal k liye dher saari badhaiyaa’n

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