24 टिप्पणियाँ

T-25/16 मैं सारी उम्र अहदे-वफ़ा में लगा रहा-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

मैं सारी उम्र अहदे-वफ़ा में लगा रहा
परिणाम कह रहा है ख़ता में लगा रहा

सारे पुराने ज़ख्म नये ज़ख्म ने भरे
बेकार इतने दिन मैं दवा में लगा रहा

कोशिश तो की मगर न सुनी रूह ने मिरी
पर जिस्म तो तुम्हारी रज़ा में लगा रहा

ऐसा नहीं कि चाँद न उतरा हो बाम पर
मैं ही तमाम रात हया में लगा रहा

ऐ अक़्ल! और होगा कोई उसकी शक्ल का
दिल कैसे मान ले वो जफ़ा में लगा रहा

घर कर लिया उदास फ़ज़ाओं ने दिल में, मैं
बाहर की ख़ुशगुवार फ़ज़ा में लगा रहा

क्या है ये ज़िन्दगी वो बताएगा किस तरह
जो शख़्स सारी उम्र क़ज़ा में लगा रहा

सूरज तो जाके चैन से बिस्तर पे सो गया
शब भर मगर चराग़ हवा में लगा रहा

मुझसे नमाज़े-इश्क़ मुक़म्मल नहीं हुई
किस मुंह से मैं कहूँ कि खुदा में लगा रहा

बहरा न मुझको कर दे ये ख़ामोशियों का शोर
केवल इसीलिए मैं सदा में लगा रहा

क्यूँ मेरे हक़ में फ़ैसला उतरा नहीं कभी
मैं भी तो उसके साथ दुआ में लगा रहा

वो चाहता है क्या ये मुझे थी ख़बर मगर
‘मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा’

इमरान हुसैन ‘आज़ाद’ 09536816624

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24 comments on “T-25/16 मैं सारी उम्र अहदे-वफ़ा में लगा रहा-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

  1. Aahahahaha, behtareen ghazal hui hai janaab, kis sher ko intekhaab karun kise chhod dun, faisla bahot mushkil hai

  2. ज़िन्दाबाद प्यारे..क्या ही उम्दा ग़ज़ल कही है.. परिणाम नें बेहद लुत्फ़ दिया…सारे पुराने ज़ख्म नए ज़ख्म नें भरे… और खामोशियों का शे’र तो कमाल ही हैं…जिंदाबाद… ढेर सारी दाद

  3. मैं सारी उम्र अहदे-वफ़ा में लगा रहा
    परिणाम कह रहा है ख़ता में लगा रहा
    बहुत आराम से यहाँ “परिणाम” की जगह “अंजाम” लफ़्ज़ का इस्तेमाल किया जा सकता था लेकिन आपने भाषा के सेतु को और अधिक सहज और सुगम बनाया है इसके लिये आप धन्यवाद के पात्र हैं !! मतले पर दाद !!
    सारे पुराने ज़ख्म नये ज़ख्म ने भरे
    बेकार इतने दिन मैं दवा में लगा रहा
    इस शेर की जितनी तारीफ की जाय कम है !! चोट पर चोट खाते जाना ज़िन्दगी है !! हर नई चोट पुराने दर्द पर हावी हो जाती है !! अखबार मे रोज़ नया हादसा पुराने को पीछे छोड कर नई बहस को जन्म देता है और ये अहर्निश चलता रहता है !! लिहाजा इस युगप्र्व्रत्ति को व्यक्तिगत अहसास के धरातल पर शेर मे कहा है !! कहन भी शिल्प भी और रवानी भी सभी लिहाज से शेर बेहतरीन कहा है !! पूरी दाद !!
    ऐसा नहीं कि चाँद न उतरा हो बाम पर
    मैं ही तमाम रात हया में लगा रहा
    मुहब्बत के निहितार्थ बहुत हैं !! – हम ही थे कमनज़र सो उसे देख कब सके
    वर्ना पसे – नक़ाब बदस्तूर चाँद था –कमल सिंह
    ऐ अक़्ल! और होगा कोई उसकी शक्ल का
    दिल कैसे मान ले वो जफ़ा में लगा रहा
    अह्ह क्या बात है !! मुहब्बत का क्या रंग है !! महबूब की परस्तिश ने मुंकिर भी बना दिया !!?? क्या बात है क्या सम्र्पण है और इश्क के लिये क्या अपने यक़ीन की शहादत है वाह !!!
    क्या है ये ज़िन्दगी वो बताएगा किस तरह
    जो शख़्स सारी उम्र क़ज़ा में लगा रहा
    “आनन्द”” फिल्म हमारे समय की है नई पीढी इससे कम आशना है लेकिन इस शेर को पढ कर उसी फिल्म का स्न्देश याद आया !! कुछ लोगों का सारा चिंतन ही म्रत्यु के इंतज़ार मे समीक्षा में और विवेचना में बीत जाता है !!!
    सूरज तो जाके चैन से बिस्तर पे सो गया
    शब भर मगर चराग़ हवा में लगा रहा
    ये ख्याल बहुत खूब है !!!
    ये शफ़क़रंग सहर सबको मुबारक लेकिन
    इसमे गुमनाम चराग़ों का लहू शामिल है-मयंक
    मुझसे नमाज़े-इश्क़ मुक़म्मल नहीं हुई
    किस मुंह से मैं कहूँ कि खुदा में लगा रहा
    दीवानो ने इस दुनिया में प्यार का नाम खुदा रख्खा है !!!
    बहरा न मुझको कर दे ये ख़ामोशियों का शोर
    केवल इसीलिए मैं सदा में लगा रहा
    लफ़्ज़ में तलाश कर नये मआनी खोज लिये है इसके लिये भी पूरी दाद !! खामुशी पर मंज़र्कशी के हवाले से दो शेर — सन्नाटे उडा देते हैं आवाज़ के पुर्ज़े
    यारो को अगर दश्ते –मुसीबत में पुकारूँ ( शायद ये शेर वज़ीर आगा का है )
    तेरी बेशर्म समाअत की कसम है मुझको
    आज के बाद तुझे कोई सदा दूँगा नहीं
    दोनो में खामुशी की तलाश दूर दूर तक की गई है !!
    वो चाहता है क्या ये मुझे थी ख़बर मगर
    ‘मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा’
    यहाँ भी मुहब्बत का एक रंग पसमज़र से गहरा होता चला जाता है !!!
    इमरान हुसैन ‘आज़ाद’ भाई !! बहुत प्रभावित किया आपकी कहन ने और आपके कलम ने !! इस ग़ज़ल के लिये धेरों बधाइयाँ –आगे भी आपसे ऐसा ही कुछ सुनने की तमन्ना है –मयंक

    • प्रणाम दादा
      आपका कमेंट पड़ने के बाद लगा की मैंने ग़ज़ल कही है
      बहुत बहुत शुक्रिया दादा
      जो बात सोच कर मैंने शेर कहा दादा आपने जूं का तूं बता दिया
      बहुत बहुत शुक्रिया दादा
      सादर
      इमरान

  4. bahut khoob imran ….kya hi achche ashaar kahe hain aapne
    aapme nikhaar aa raha hai
    mubarakbaad qubul keejiye

  5. MUJH SE NAMAAZ-E-ISHQ MUKAMMAL NAHI’N HUI waah waah kya kahne janab mubaarakbaad

  6. सारे पुराने ज़ख्म नये ज़ख्म ने भरे
    बेकार इतने दिन मैं दवा में लगा रहा

    इमरान भाई। वाह..वाह..वाह…। बहुत अच्‍छा कलाम।

    अच्‍छी ग़ज़ल के लिए दिली दाद।
    सादर
    नवनीत

  7. janaab Azaad saheb behtareen murassa gazal huee hai har she’r ke liye daad hazir hai

  8. ऐ अक्ल….
    मैं जानता था…
    वाह इमरान जी खूब सुन्दर शेर पिरोये हैं आपने अपनी ग़ज़ल में….
    ढेरों दाद क़ुबूल कीजिये
    सादर
    पूजा

  9. सारे पुराने ज़ख्म नये ज़ख्म ने भरे
    बेकार इतने दिन मैं दवा में लगा रहा
    bahut khuub

  10. AISA NAHIN K CHAAND N UTRA HO BAAM PAR
    MAIN HI TAMAAM RAAT HAYA MEN LAGA RAHA

    wAH IMRAN MIYAN WAH, ZINDABAD.

  11. इमरान इस ज़मीन में शायद ही ये काफ़िया इससे बेहतर बाँधा जा सकता है

    सारे पुराने ज़ख्म नये ज़ख्म ने भरे
    बेकार इतने दिन मैं दवा में लगा रहा

    कैसा अच्छा शेर है भाई ….ये एक शेर पूरे मुशायरे पर भारी है …बहुत बहुत मुबारकबाद भाई

    और

    मुझसे नमाज़े-इश्क़ मुक़म्मल नहीं हुई
    किस मुंह से मैं कहूँ कि खुदा में लगा रहा

    बहरा न मुझको कर दे ये ख़ामोशियों का शोर
    केवल इसीलिए मैं सदा में लगा रहा

    बेहद अच्छी ग़ज़ल कही भाई ….कितनी मुश्किल ज़मीन में कितनी आसानी से शेर कहे है ….वाह

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