16 टिप्पणियाँ

T-25/11 खिदमत बराए-खल्क़े-ख़ुदा में लगा रहा-शाहिद हसन ‘शाहिद’

खिदमत बराए-खल्क़े-ख़ुदा में लगा रहा
दुनिया-ओ-दीन की वो बक़ा में लगा रहा

अंजाम भूल, कारे-जफ़ा में लगा रहा
“मैं उसके साथ साथ दुआ में लगा रहा ”

दामन बचा सका न गुनाहों के फ़ेल से
वैसे खुदा की हम्दो-सना में लगा रहा

इंसान दिल से खौफे-ख़ुदा को निकाल कर
दिन रात इरतिकाबे-खता में लगा रहा

तकमीले-इश्क़ जलना है करके तवाफ़े-शम्म
परवाना अपने अहदे-वफ़ा में लगा रहा

खुद आशना तो हो न सका आदमी ,मगर
औरों की खोलने को क़बा में लगा रहा

फूलों का खून करके भी इन्सां का है ख़याल
अपने तईं वो कारे-जज़ा में लगा रहा

ईमान उसकी ज़ात का होता है रुक्ने-ख़ास
दिल जिस बशर का दर्से-ख़ुदा में लगा रहा

फ़ुर्सत मिली न, देखता खुशियाँ उठा के आँख
सर आई नामुराद बला में लगा रहा

‘शाहिद’ भुला के सारे मुहासिन हयात के
ज़ुल्फ़ों की तेरी काली घटा में लगा रहा

शाहिद हसन ‘शाहिद’ 09759698300

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16 comments on “T-25/11 खिदमत बराए-खल्क़े-ख़ुदा में लगा रहा-शाहिद हसन ‘शाहिद’

  1. शाहिद साहब।
    बहुत उम्‍दा कलाम। मयंक भाई की टिप्‍पणी के बाद कहने को कुछ रह नहीं जाता।
    इतनी खूबसूरत-खूबसीरत ग़ज़ल के लिए दिल से शुक्रिया।
    सादर
    नवनीत

  2. ये ideologist की गज़ल है !! इंसान अपने अहसास को दस्तावेज़ करता है –इनमे से गैर्ज़रूरी और बातिल वक़्त के साथ फना हो जाते हैं और जो सच है वो वक्त की ज़ाँविदानी सरहदो को लाँघ कर मुकर्रर रहता है !! सभी शेर किसी न किसी अमृत जीवन मूल्य के पैरोकार हैं !!
    ईमान उसकी ज़ात का होता है रुक्ने-ख़ास
    दिल जिस बशर का दर्से-ख़ुदा में लगा रहा
    ऐसे अश आर पर सवाल नही बहस नहीं –ये सिर्फ स्वीकार के शेर हैं !! बुनावट में कोई रियाकारी नहीं है शफ़्फाफ़ पानियों जैसा बयान है !!
    तकमीले-इश्क़ जलना है करके तवाफ़े-शम्म
    परवाना अपने अहदे-वफ़ा में लगा रहा
    राख हो के बिखर जाना नियति है परवाने को इसका इल्म है लेकिन वो शम्म: का तवाफ़ मरते दम करता है !! एक मोमिन की ज़िन्दगी का मंज़र भी यही है !!!
    खुद आशना तो हो न सका आदमी ,मगर
    औरों की खोलने को क़बा में लगा रहा
    इस गुमरही के दौर में कौन है जो इस व्रत्ति का शिकार नहीं !!
    फूलों का खून करके भी इन्सां का है ख़याल
    अपने तईं वो कारे-जज़ा में लगा रहा
    चन्द मासूम से पत्तों का लहू है फाक़िर
    जिसको महबूब के हाथों मे हिना कहते हैं –सुदर्शन फ़ाकिर्
    ईमान उसकी ज़ात का होता है रुक्ने-ख़ास
    दिल जिस बशर का दर्से-ख़ुदा में लगा रहा
    फ़ुर्सत मिली न, देखता खुशियाँ उठा के आँख
    सर आई नामुराद बला में लगा रहा
    बेशतर ज़िन्दगी तो एहतियात और पाबन्दी में गुज़र जाती है !! दिलो जेहन की आज़ादी किसको नसीब !!
    ‘शाहिद’ भुला के सारे मुहासिन हयात के
    ज़ुल्फ़ों की तेरी काली घटा में लगा रहा
    जो कि श्रंगार का एक अच्छा शेर है !!
    शाहिद साहब आपकी पाकीज़गी बहुत मुतास्सिर करती है और साफगोई बेहद प्रभावित करती है !! इस गज़ल के लिये मुबरकबाद कुबूल कीजिये –मयंक

  3. दामन बचा सका न गुनाहों के फ़ेल से
    वैसे खुदा की हम्दो-सना में लगा रहा

    बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल शाहिद भाई…
    मुबारक़.

  4. Shahid Sahab, bohot hi achchi gazal huyi hai! Mubarak

  5. शाहिद जी एक बेहद कामयाब ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत मुबारक बाद

  6. KHUD-AASHNA TO HO NA SAKA AADMI MAGAR…… WAAH WAAH MUHTARAM SHAAHID SAHAB SABHI ASH’AAR KHOOB HAIN, MUBAARAKBAAD….

  7. दामन बचा सका न गुनाहों के फ़ेल से
    वैसे खुदा की हम्दो-सना में लगा रहा
    nice

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