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T-25/9 शद्दाद ज़र्बे-दर्दफ़िज़ा में लगा रहा-शाज़ जहानी

शद्दाद ज़र्बे-दर्दफ़िज़ा में लगा रहा
मज़्लूम ज़ब्ते-आहो-बुका में लगा रहा

जर्राह की भी मेरी तरह पहली चोट थी
‘मैं उसके साथ साथ दुआ में लगा रहा’

जिससे लगा रखी थी तवक़्क़ो शबे-फिराक़
ता देर वह नजूम समा में लगा रहा

बहता रहे जो आब तो पत्थर को काट दे
जीता वो दिल जो अर्ज़े-वफ़ा में लगा रहा

दुनिया के जो भंवर में फँसा, ग़र्क़ हो गया
अच्छा है वो जो राहे-ख़ुदा में लगा रहा

हासिल न हो सकेगा कभी बातिनी सुकूँ
गर दिल तुम्हारा नुक़्रो-तिला में लगा रहा

जब कुछ न ऐतराज़ हुआ उसकी सम्त से
बेबाक फिर मैं अपनी ख़ता में लगा रहा

है आज वो उरूज प बस एक वज्ह से
हुक्काम की वो हम्दो सना में लगा रहा

वह सेंध भी लगा चुका, हो भी चुका फ़रार
यह “जागते रहो” की सला में लगा रहा

मालूम था उसे कि मरज़ लाइलाज है
ज़िद देखिए, वो फिर भी दवा में लगा रहा

हर रोज़ हो रहा है ये पहले से बदनुमा
उस लफ़्ज़े-कुन का दाग़ ख़ला में लगा रहा

ये ‘शाज़’ तो फ़य्याज़ सदा का है दोस्तो
माँगा कभी न , सिर्फ़ अता में लगा रहा

शाज़ जहानी 09350027775

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10 comments on “T-25/9 शद्दाद ज़र्बे-दर्दफ़िज़ा में लगा रहा-शाज़ जहानी

  1. मेरे पास इस वक़्त लुगत नहीं है इसलिये इस गज़ल में पूरा तो नही उतर पाऊंगा !!! लेकिन ये समन्दर शफ़्फाफ है और इसकी तह में मोती साफ देखे जा सकते हैं साहिल से भी !! जो रिवायती कहानियाँ इसको सम्झने के लिये ज़रूरी हैं वो भी गज़ल में हवाले तौर पर दे देना मेरे ख्याल से एक ज़रूरत है !!
    शद्दाद ज़र्बे-दर्दफ़िज़ा में लगा रहा
    मज़्लूम ज़ब्ते-आहो-बुका में लगा रहा
    इस शेर को सलाम !! ये है मुरस्सा कलाम !!
    जर्राह की भी मेरी तरह पहली चोट थी
    ‘मैं उसके साथ साथ दुआ में लगा रहा’
    एक शेर है –
    क़ैस सहरा में अकेला है मुझे जाने दो
    खूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो
    ठीक वैसा ही जहानी साहब का भी शेर है बस !! इस शेर का किरदार जुदा है !! वाह !!
    जिससे लगा रखी थी तवक़्क़ो शबे-फिराक़
    ता देर वह नजूम समा में लगा रहा
    सितारों मे और हाथ की लकीरों में –हम कब और क्या क्या तलाश्ते है !! इसकी निशान्देही ये शेर कर रहा है !!
    बहता रहे जो आब तो पत्थर को काट दे
    जीता वो दिल जो अर्ज़े-वफ़ा में लगा रहा
    इस शेर की कहन और शिल्प पर भरपूर दाद !! ये नज़ीर भी है !!! अतिशत रगड करें जो कोई //अनल प्कट चन्दन से होई !! जैसी बात है इसमे !!!
    दुनिया के जो भंवर में फँसा, ग़र्क़ हो गया
    अच्छा है वो जो राहे-ख़ुदा में लगा रहा
    तस्लीम !! लेकिन मालिक ये हो नहीं पाता है !!
    हासिल न हो सकेगा कभी बातिनी सुकूँ
    गर दिल तुम्हारा नुक़्रो-तिला में लगा रहा
    उसके लिये एक खास तनहाई चहिये !!! उसका साथ चाहिये और जब कोई दूसरा नहीं होता की शर्त चाहिये !!!
    जब कुछ न ऐतराज़ हुआ उसकी सम्त से
    बेबाक फिर मैं अपनी ख़ता में लगा रहा
    उधर चुपचाप लिखा पढी चलती रहती है !! बाद में यकलख़्त चार्जशीट मिलती है तब हवास गुम हो जाते हैं !! मैं भी सोचता था कि नाकर्दा गुनाहों को हसरत की दाद न मिल जाये कहीं !! फिर जब दाद मिली तो तबीयत दुरुस्त हो गई !!
    है आज वो उरूज प बस एक वज्ह से
    हुक्काम की वो हम्दो सना में लगा रहा
    बेशक बेशक !!
    वह सेंध भी लगा चुका, हो भी चुका फ़रार
    यह “जागते रहो” की सला में लगा रहा
    ही ही ही !!! जागते रहो sssssssssssss( मेरा भरोसा मत करो) !!!
    मालूम था उसे कि मरज़ लाइलाज है
    ज़िद देखिए, वो फिर भी दवा में लगा रहा
    इलाज इन मसीहाओं का करना चाहिये जो मर्ज़े – इश्क के चारगर हैं !!
    ये ‘शाज़’ तो फ़य्याज़ सदा का है दोस्तो
    माँगा कभी न , सिर्फ़ अता में लगा रहा
    शाज़ जहानी साहब !! बहुत खूब !! बस आप हम कम इल्म पाठ्कों से मेहनत बहुत करवाते हैं गज़ल पढ्ते समय !!! –गज़ल के लिये मुबारकबाद –मयंक

  2. शाज़ साहब
    उम्दा ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा

  3. umdah ghazal hai. tamam hi ashaar achche hain. Wah SHAZ janab.

  4. DUNIYA KE JO BHA’NWAR ME’N PHA’NSA GHARQ HO GAYA = ACHCHHA HAI WO JO RAAH E KHUDA ME’N LAGA RAHA. .. BEHTAREEN SHER SHAAZ SAHAB WAAH, DAAD QABOOL KARE’N

  5. Shaaz Sahab, behtareen gazal. Dhero daad!!

  6. शाज़ साहब।
    बहुत उम्‍दा ग़ज़ल और कई शे’र तो जानलेवा हैं।
    इस ग़ज़ल के आभार।
    सादर
    नवनीत

  7. है आज वो उरूज प बस एक वज्ह से
    हुक्काम की वो हम्दो सना में लगा रहा
    khuub

  8. जिससे लगा रखी थी तवक़्क़ो शबे-फिराक़
    ता देर वह नजूम समा में लगा रहा

    बहता रहे जो आब तो पत्थर को काट दे
    जीता वो दिल जो अर्ज़े-वफ़ा में लगा रहा

    वाह वाह !!
    क्या कहने शाज़ भाई..
    मुबारक़.

  9. बहता रहे जो आब तो पत्थर को काट दे
    जीता वो दिल जो अर्ज़े-वफ़ा में लगा रहा
    Bahut achi gazal hui sir
    dili daad qubul kijiye

  10. बहता रहे जो आब तो पत्थर को काट दे
    जीता वो दिल जो अर्ज़े-वफ़ा में लगा रहा

    जब कुछ न ऐतराज़ हुआ उसकी सम्त से
    बेबाक फिर मैं अपनी ख़ता में लगा रहा

    हर रोज़ हो रहा है ये पहले से बदनुमा
    उस लफ़्ज़े-कुन का दाग़ ख़ला में लगा रहा

    ये ‘शाज़’ तो फ़य्याज़ सदा का है दोस्तो
    माँगा कभी न , सिर्फ़ अता में लगा रहा

    क्या अच्छे अच्छे शेर निकाले है, वाह वाह…क्या कहना

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