23 Comments

T-25/8 तुम हो गए ख़ुदा तो ख़ुदा में लगा रहा -नवनीत शर्मा

तुम हो गए ख़ुदा तो ख़ुदा में लगा रहा
गर ये ख़ता है ठीक, ख़ता में लगा रहा

वो इश्‍क़ की दुकान बढ़ा कर निकल गए
नाहक मैं उसके बाद सदा में लगा रहा

ढांपा किसे है किसने ये उक़्दा अजीब है
पैवंद बन मैं अपनी क़बा में लगा रहा

ख़ुद में उतर के जीना कोई बात ही नहीं ? ? ?
मैं उम्र भर तलाशे-हवा में, लगा रहा

क्‍या-क्‍या किया था धूप ने सहरा में क्‍या कहूं
मेरा तो ध्‍यान तेरी घटा में लगा रहा

पैरों पे जम ही जाना था आख़िर में बहता ख़ून
तो सोचता हूँ क्यों मैं दुआ में लगा रहा

देखा वही हुआ न, मैं सूरज से जल गया
उसकी नहीं ख़ता मैं सला में लगा रहा

अाते थे गीत इसको बहारों के कुछ मगर
पंछी उदास आब-अो-गिज़ा में लगा रहा

तारों को तोड़ लाऊंगा इक चांद के लिए
मुमकिन थी ऐसी बात ? हवा में, लगा रहा

उसको पुकारा उसकी तरफ से दिये जवाब
मैं सारी उम्र सौतो-सदा में लगा रहा

उसकी तरफ़ से मर भी चुका राख हो चुका
इकतरफ़ा इश्क़ की मैं दवा में लगा रहा

इस मरहले पे आके लगा है मुझे मियां
क्‍या शौक़ था मैं गर्दे-फ़ना में लगा रहा

बचपन में बादलों में बनाये थे चंद ख़ाब
उनको तलाशने में ख़ला में लगा रहा

कैसे समझ में आयेंगी आदम की मुश्किलें
उसको जो सारी उम्र ख़ुदा में लगा रहा

जिसकी दुआ में मेरा कहीं जि़क्र तक नहीं
‘मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा’

नवनीत शर्मा 09418040160

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

23 comments on “T-25/8 तुम हो गए ख़ुदा तो ख़ुदा में लगा रहा -नवनीत शर्मा

  1. बचपन में बादलों में बनाये थे चंद ख़ाब
    उनको तलाशने में ख़ला में लगा रहा
    कैसे समझ में आयेंगी आदम की मुश्किलें
    उसको जो सारी उम्र ख़ुदा में लगा रहा
    वाह वाह navneeet जी बधाई हो

  2. तुम हो गए ख़ुदा तो ख़ुदा में लगा रहा
    गर ये ख़ता है ठीक, ख़ता में लगा रहा
    सर झुकओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा & परस्तिश की याँ तक कि ऐ बुत तुझे //नज़र में सभू की खुदा कर चले !! –लेकिन नवनीत भाई के मतले में –तुम हो गये खुदा !!! … वाह क्या बात है !! महबूब के चल्ते आत्म्सम्मोहन की अति है कि उसे खुदा बनाया नहीं गया है वो खुदा हो गया है वाह वाह !!
    वो इश्क़म की दुकान बढ़ा कर निकल गए
    नाहक मैं उसके बाद सदा में लगा रहा
    “” दुकान” इस एक लफ़्ज़ ने इस शेर मे सब कुछ कह दिया !! इश्क के ताजिर ने ठग लिया !! और क्या रवानी है ज़ुबान की कहन में वाह वाह !!!
    ढांपा किसे है किसने ये उक़्दा अजीब है
    पैवंद बन मैं अपनी क़बा में लगा रहा
    अच्छा शेर कहा है !!! इस मफ्हूम पर अगली गज़लों मे भी एक शेर कहा गया है !!!
    ख़ुद में उतर के जीना कोई बात ही नहीं ? ? ?
    मैं उम्र भर तलाशे-हवा में, लगा रहा
    मैं एक मश्वरा दूँ ??!! — बुझी न प्यास समन्दर तेरे शिनावर की
    जो खुद में डूब गया उसको काइनात मिली !!!-मयंक
    और ये तस्व्वुर नहीं इल्म है –दिनाँक 10.10.1989 का शाहिद मैं खुद हूँ !!
    क्याे-क्याा किया था धूप ने सहरा में क्यार कहूं
    मेरा तो ध्यायन तेरी घटा में लगा रहा
    अहह अहह !! मुहब्बत और गहरी कर दी इस बयान ने !!!
    पैरों पे जम ही जाना था आख़िर में बहता ख़ून
    तो सोचता हूँ क्यों मैं दुआ में लगा रहा
    चौथी सम्त की जुस्तजू छिपी है इस शेर में!!! लेकिन इतना हौसला और ज़ुल्मात के तईं इतनी बेपरवाही इस मुकाम पर लाती है –जब जब खुदी बुलन्द होगी तब यही होगा !!!
    देखा वही हुआ न, मैं सूरज से जल गया
    उसकी नहीं ख़ता मैं सला में लगा रहा
    सम्पाती का प्रकरण है और बहुत अच्छे से कहा है !!!
    अाते थे गीत इसको बहारों के कुछ मगर
    पंछी उदास आब-अो-गिज़ा में लगा रहा
    सायबाँ खानाबदोशों के हवाले कर दे
    ये घना पेड परिन्दों के हवाले कर दे –मुनव्वर
    इसके बाद पंछी अपनी धुन पर लौट सकते हैं !! –लेकिन अहसास की शिद्दत बडी स्पष्ट है शेर में –नवनीत भाई !! हम पंछी एक डाल के हैं !!! मुझे भी नौकरी ग़ज़ल नहीं कहने देती !!
    तारों को तोड़ लाऊंगा इक चांद के लिए
    मुमकिन थी ऐसी बात ? हवा में, लगा रहा
    आखिर कमिटमेण्ट की लाज रखनी है!! लेकिन एक मश्वरा फिर —
    फासला आँख का धोखा भी तो हो सकता है
    चाँद चमके तो ज़रा हाथ बढा कर देखो –निदा
    उसको पुकारा उसकी तरफ से दिये जवाब
    मैं सारी उम्र सौतो-सदा में लगा रहा
    किसी के हाथ से गिरकर बिखर जाना आइने की ज़िन्दगी का भी मुकम्मल होना होता है !!! वाह !! महबूब की पैरवी और पर्स्तिश दीवानगी है और दीवानगी ज़िन्दगी की इंतेहा है !!!
    इस मरहले पे आके लगा है मुझे मियां
    क्यार शौक़ था मैं गर्दे-फ़ना में लगा रहा
    अरे नहीं ??!! इतना बालिग शऊर इस उम्र में ठीक नहीं !! इसे हम उम्र के ज़वाल वालों के लिये छोड दो !!!
    बचपन में बादलों में बनाये थे चंद ख़ाब
    उनको तलाशने में ख़ला में लगा रहा
    क्या बात है क्या बात है क्या बात है –क्या मंज़र है क्या ख्याल है क्या इज़हार है और क्या शेर कहा है वाह वाह !!!
    कैसे समझ में आयेंगी आदम की मुश्किलें
    उसको जो सारी उम्र ख़ुदा में लगा रहा
    ज़ाहिद !! दाना !! दैरो हरम !!! आप शैर हैं न !! –इनको आम अहसास से सिवा समझते ही हैं !!!
    जिसकी दुआ में मेरा कहीं जि़क्र तक नहीं
    ‘मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा’
    क्या बात खोब गिरह लगाई है !!
    नवनीत भाई खूब गज़ल कही है –ये आपके तस्व्वुर की बुलन्दी की –आपकी जदीदियत की रसाई की और आपकी कुव्वते गोयाई की भरपूर नुमाइन्दगी करती है –बहुत बहुत मुबारकबाद –मयंक

    • आदरणीय मयंक भाई साहब।
      प्रणाम।

      ग़ज़ल कहने के बाद शायर दाद की उम्‍मीद करता है… उस माता-पिता की तरह जो बच्‍चे की हमेशा तारीफ़ ही सुनना चाहते हैं…. बच्‍चा जैसा भी हो, अपेक्षा तारीफ़ ही की रहती है। मुझे भी प्रशंसा अच्‍छी लगती है। लेकिन सच कहूं तो मैं अपनी ग़ज़ल को तब तक मुकम्‍मल नहीं मानता जब तक आप की टिप्‍पणी उसे हासिल न हो जाए। आपकी यह महब्‍बत मेरी पूंजी है।
      सादर
      नवनीत

  3. उसको पुकारा उसकी तरफ़ से दिए जवाब
    वाह नवनीत जी
    क्या अच्छे अच्छे अश्आर बुने है ग़ज़ल में आपने
    मुबारक़ हो
    सादर
    पूजा

  4. Naveen Sharma saheb. apke ashaar padhkar aisa laga k aap jitne marzi sheir kah sakte the. bala ki aamad hai aap par. Wah. bahut mubarak

    • जनाब शाहिद हसन शाहिद सााहब,
      अापकी महब्‍बत के लिए मशकूर हूं।
      बड़ करम।
      सादर
      नवनीत

  5. US KO PUKAARA US KI TARAF SE DIYE JAWAAB = MAI’N SAARI UMR SAUT-O- SADAA ME’N LAGA RAHA
    NAUNEET SHARMA JI KHOOB KAHA HAI WAAH…BADHAAIYAA’N QABOOL KARE’N

    • अापकी महब्‍बत का कायल हूं जनाब शफी़क़ रायपुरी साहब। करम बना रहे।
      सादर
      नवनीत

  6. Umda ..

  7. Navneet ji…kya khoob gazal hai!! Daad kubul farmaye..

  8. बचपन में बादलों में बनाये थे चंद ख़ाब
    उनको तलाशने में ख़ला में लगा रहा
    khuub

  9. क्‍या-क्‍या किया था धूप ने सहरा में क्‍या कहूं
    मेरा तो ध्‍यान तेरी घटा में लगा रहा

    नवनीत भाई..
    बेहतरीन ग़ज़ल के लिये दिली दाद क़ुबूल कीजिये.

    • भाई बकुल देव साहब।
      आपने मेरी ग़ज़ल तक पहुंचे और इसे सराहा। बहुत अच्‍छा लगा। बहुत आभार।
      सादर
      नवनीत

  10. wahhhh Wahhhhh
    BAhut achi gazal hui sir
    dili daad qubul kijiye
    sadar
    Imran

  11. क्‍या-क्‍या किया था धूप ने सहरा में क्‍या कहूं
    मेरा तो ध्‍यान तेरी घटा में लगा रहा

    अाए हाय हाय….अहा हा हा हा….वाह वाह…ये है ख़ालिस बब्बर शेर….वाह वाह वाह

    तमाम ग़ज़ल बहुत अच्छी हुई है, इतनी मुश्किल ज़मीन में इतने सारे जाविए तलाश करना वाकई काबिले दाद है

    • दिनेश भाई।
      आप जैसा शायर तारीफ़ करे तो खु़द पर भरोसा होने लगता है। बहुत मशकूर हूं।
      सादर
      नवनीत

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: