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T-25/7 हर लम्हा सिर्फ हम्दो-सना में लगा रहा-नूरुद्दीन नूर

हर लम्हा सिर्फ हम्दो-सना में लगा रहा
मैं हक़-परस्त रहे-ख़ुदा में लगा रहा

क्या ग़ैर मेरे अपने भी मेरे ख़िलाफ़ थे
मैं उम्र भर तलाशे-वफ़ा में लगा रहा

मेरी ज़रूरतों का जिसे इल्म ही न था
“मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”

अहले-ख़िरद ने बाँट लीं दुनिया की दौलतें
दीवाना सिर्फ आहो-बुका में लगा रहा

मैं गोशा-ए-ख़ुलूस में तन्हा हूँ आज भी
हर शख़्स अपने क़स्रे-अना में लगा रहा

हम बेगुनाह दारो-रसन तक पहुँच गये
मुंसिफ़ किताबे-जुर्मो-सज़ा में लगा रहा

इंसानियत की ख़ैर ही पेशे-नज़र रही
मैं नूर बनके हर्फ़ो-सदा में लगा रहा

नूरुद्दीन नूर 09663435838

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10 comments on “T-25/7 हर लम्हा सिर्फ हम्दो-सना में लगा रहा-नूरुद्दीन नूर

  1. मेरी ज़रूरतों का जिसे इल्म ही न था
    “मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”
    ऐसा ही होता है !! गुमनाम मुहब्बत और गुमनाम अक़ीदत की पाकीज़गी उनसे बडी है जिनका इज़हार हुआ और जो राहे आम तलक पहुंचीं !! गिरह पर दाद !!
    अहले-ख़िरद ने बाँट लीं दुनिया की दौलतें
    दीवाना सिर्फ आहो-बुका में लगा रहा
    दुनिया की दौलतें वैसे दीवाने की ज़रूरत भी नहीं होतीं –लेकिन जो सच है वो यही है जो शेर मे कहा गया !!!
    मैं गोशा-ए-ख़ुलूस में तन्हा हूँ आज भी
    हर शख़्स अपने क़स्रे-अना में लगा रहा
    बहुत खूब !! बहुत खूब !! और इसकी इंतेहा में कभी कभी — मत छेडिये हमारे चरागे ख़ुलूस को
    शायद कोई शरार ही मुँह पर उछल पडे
    हम बेगुनाह दारो-रसन तक पहुँच गये
    मुंसिफ़ किताबे-जुर्मो-सज़ा में लगा रहा
    हासिले गज़ल शेर है –यहाँ मुंसिफ लफ़्ज़ को वुस अत अता की गई है – ये लफ्ज़ सभी रहबरों और अक़ीदों को खुद मे समेट ले रहा है यहा पर !!!
    इंसानियत की ख़ैर ही पेशे-नज़र रही
    मैं नूर बनके हर्फ़ो-सदा में लगा रहा
    मुबारक हो तख़ल्लुस का बेहतरीन इस्तेमाल किया है !!!
    नूरुद्दीन नूर साहब !! दाद क़ुबूल कीजिये !!! –मयंक

  2. हम बेगुनाह…..
    वाह वाह
    क्या बात है।
    खूब ग़ज़ल हुई है नूर साहब
    बधाई
    सादर
    पूजा

  3. मैं गोशा-ए-ख़ुलूस में तन्हा हूँ आज भी
    हर शख़्स अपने क़स्रे-अना में लगा रहा

    नूर भाई…
    एक बेहतरीन ग़ज़ल के लिये बधाई..

  4. Nooruddin ‘NOOR’ saheb. kis kis sheir ka zikr kiya jaye. bahut umdah ghazal hai. congrats

  5. Nurooddin Sahab, bohot khoob gazal!! Yeh sher bohot pasand aaya
    अहले-ख़िरद ने बाँट लीं दुनिया की दौलतें
    दीवाना सिर्फ आहो-बुका में लगा रहा
    daad kubul farmaye!!

  6. हम बेगुनाह दारो-रसन तक पहुँच गये
    मुंसिफ़ किताबे-जुर्मो-सज़ा में लगा रहा……….

    बहुत खू़ब शे’र। लेकिन आदरणीय, इसका यह अर्थ नहीं कि बाकी अश्‍आर कम हैं। दरअस्‍ल सारी ग़ज़ल अच्‍छी हुई जिसके लिए दिली दाद कबूल करें लेकिन यह शे’र मुझे निजी कारणों से बहुत अच्‍छा लगा। छप गया दिल पर।
    ज़बान के प्रयोग की बात भी शायद दिनेश भाई ने की है। मैं उस बात से सहमत हूं। बहुत अच्‍छी ग़ज़ल के लिए बहुत शुक्रिया।
    सादर
    नवनीत

  7. बेहतरीन ग़ज़ल नूर साहब, सभी अशआर क़ाबिले दाद हैं “मुबारकबाद”

  8. इंसानियत की ख़ैर ही पेशे-नज़र रही
    मैं नूर बनके हर्फ़ो-सदा में लगा रहा

    अहले-ख़िरद ने बाँट लीं दुनिया की दौलतें
    दीवाना सिर्फ आहो-बुका में लगा रहा

    वाह वाह क्या धुली मंझी ज़बान है…हर शेर नूर की तरह चमक रहा है इस बज़्म में, क्या अच्छी ग़ज़ल अता की है साहब

    बहुत मुबारकबाद

  9. अहले-ख़िरद ने बाँट लीं दुनिया की दौलतें
    दीवाना सिर्फ आहो-बुका में लगा रहा

    bahut khuub

  10. Bahut achi gazal hui noor sahab
    dili daad qubul kijiye
    REgards

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