9 टिप्पणियाँ

T-25/5 पैवन्द इक न एक क़बा में लगा रहा-असरार उल हक़ असरार

पैवन्द इक न एक क़बा में लगा रहा
ताउम्र मैं रफ़ू की सज़ा में लगा रहा

फिर आज मुझको ताज़ा ख़ुदा की तलाश है
कल तक तो मैं पुराने ख़ुदा में लगा रहा

उस दर्द ही ने दिल को दिया दिल का मरतबा
जिस दर्द की सदा मैं दवा में लगा रहा

सजदा ब सजदा लोग तो मस्जूद हो गए
मैं पल-ब-पल फ़रोग़े-अना में लगा रहा

रावण तो एक उसमें भी था अब पता चला
जिस राम की मैं राम-कथा में लगा रहा

है मांगने में कौन ज़ियादा हुनरशनास
मैं इम्तियाज़े-शाहो-गदा में लगा रहा

पहले तो मैं बिछाता रहा दर ब दर जबीं
और फिर बस अपनी हम्दो-सना में लगा रहा

धरती की जीभ सूख के पत्थर हुई तो क्या
वो इंद्र था सो अपनी सभा में लगा रहा

‘असरार’ कबकी मुझको उड़ा ले गयी हवा
और मैं कि इख़्तिलाफ़े-हवा में लगा रहा

असरार उल हक़ असरार 09410274896

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

9 comments on “T-25/5 पैवन्द इक न एक क़बा में लगा रहा-असरार उल हक़ असरार

  1. इस गज़ल की गहराई और वैचारिक दूरदृष्टिपरता पर देर तलक तालियाँ —
    पैवन्द इक न एक क़बा में लगा रहा
    ताउम्र मैं रफ़ू की सज़ा में लगा रहा
    कबा तो फक़ीर पहनते हैं फिर भी अपनी सदाकत पर उन्हें तश्रीह देनी पडे तो ये दौरे हाज़िर पर भरपूर वंगोक्ति और वक्रोक्ति भी है- मतले पर दाद !!!
    फिर आज मुझको ताज़ा ख़ुदा की तलाश है
    कल तक तो मैं पुराने ख़ुदा में लगा रहा
    यहाँ भी आत्म्विश्लेषण के हवाले से एक युगपृव्रत्ति पर भरपूर तंज़ है –
    बकौल इफ़्तिख़ार आरिफ –
    हर नई नस्ल को इक ताज़ा मदीने की तलाश
    साथियों अब कोई हिज्रत नहीं होने वाली
    उस दर्द ही ने दिल को दिया दिल का मरतबा
    जिस दर्द की सदा मैं दवा में लगा रहा
    परवान चढ रहा है मेरा दर्दे जिगर आज
    लिकमान किसलिये कोई उस्ताद किया जाय – क्योंकि दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना साथ ही
    लो हम मरीज़े इश्क़ के तीमारदार हैं
    अच्छा अगर न हो तो मसीहा का क्या इलाज –ग़ालिब
    इस रोग की दवा नहीं और इस रोग से शख़्सीयत को मरतबा यक़ीनन मिलता है !!!
    सजदा ब सजदा लोग तो मस्जूद हो गए
    मैं पल-ब-पल फ़रोग़े-अना में लगा रहा
    खुददार शाइर का बयान है !!
    रावण तो एक उसमें भी था अब पता चला
    जिस राम की मैं राम-कथा में लगा रहा
    चाँद पे दाग का इल्जाम लगा देते हो
    किस सफाई से मियाँ काम लगा देते हो
    जब भी किरदार उठाना हो किसी रावण का . तुम कहानी मे कहीं राम लगा देते हो –मयंक
    है मांगने में कौन ज़ियादा हुनरशनास
    मैं इम्तियाज़े-शाहो-गदा में लगा रहा
    शहंशाह ही ज़ियादा हुनरशनास है माँगने में – ये देखने में सखी है लेकिन महसूस करने में गदाओं का भी सरताज है जैसे समन्दर की तिश्नगी तमाम नदियों का पानी पी कर भी नहीं बुझती वैसे ही इनकी भी लिप्सा त्रप्त नहीं होती !!!
    पहले तो मैं बिछाता रहा दर ब दर जबीं
    और फिर बस अपनी हम्दो-सना में लगा रहा
    अब सही जगह पर आये हैं आप यही –रास्ता भी है !!!
    धरती की जीभ सूख के पत्थर हुई तो क्या
    वो इंद्र था सो अपनी सभा में लगा रहा
    इश्तियारे पर दाद !!!
    ‘असरार’ कबकी मुझको उड़ा ले गयी हवा
    और मैं कि इख़्तिलाफ़े-हवा में लगा रहा
    मक़्ते पर भी भर[पूर दाद !!!
    बहुत उम्दा बयान है वाह वाह खत्म ही नहीं हो रही !!! बहुत बहुत मुबारकबाद –मयंक

  2. उस दर्द ही ने दिल को दिया दिल का मरतबा
    जिस दर्द की सदा मैं दवा में लगा रहा

    वाह….वाह…वाह…।
    असरार साहब की ग़ज़ल हमेशा की तरह भरपूर संतुष्टि देने वाली है।
    आपका आभार।
    सादर
    नवनीत

  3. रावण तो एक उसमें भी था अब पता चला
    जिस राम की मैं राम-कथा में लगा रहा

    वो इद्र था सो अपनी सभा में लगा रहा

    क्याबात है वाह वाह असरार साहेब

  4. असरार साहब कैसी उस्तादाना ग़ज़ल है…मतला ऐसा कि ठिठक के रह गया,,,
    उस दर्द ही ने दिल को दिया दिल का मरतबा
    जिस दर्द की सदा मैं दवा में लगा रहा
    कैसा रवायती लेकिन सच्चा शे’र है…
    रामकथा और सभा का भी जवाब नहीं…. जिंदाबाद zindabaad

  5. Asrar sahab kya khub gazal hui hain….धरती की जीभ सूख के पत्थर हुई तो क्या
    वो इंद्र था सो अपनी सभा में लगा रहा…iss sher ka to koi jawab hi nahi……daad qubul kare……
    Saify Raipur

  6. Asrar sahab buhut umda ghazal kahi aapne..
    Kya kya qafiye bandhe hain…Waaah daad qubul keejiye

  7. असरार साहब
    ख़ूब ग़ज़ल हुई है। और मतला तो कमाल ही है।
    ढेरों बधाई
    सादर
    पूजा

  8. धरती की जीभ सूख के पत्थर हुई तो क्या
    वो इंद्र था सो अपनी सभा में लगा रहा

    khuub

  9. हज़रत…

    ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद !!!!

    कैसे अच्छे अच्छे शेर कहें हैं साहब,

    हर शेर अपने आप में एक कलाम है , वाह वाह वाह

    और मतला

    पैवन्द इक न एक क़बा में लगा रहा
    ताउम्र मैं रफ़ू की सज़ा में लगा रहा

    ज़िंदाबाद साहब ज़िंदाबाद

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: