19 Comments

T-25/4 ख़ुदबीं था हुस्न अपनी अदा में लगा रहा-नाज़िम नक़वी

ख़ुदबीं था हुस्न अपनी अदा में लगा रहा
और इश्क़ भी उसी की बक़ा में लगा रहा

सब अपने अपने हिस्से का ग़म बांचते रहे
और मैं था इक परी की कथा में लगा रहा

हमने उसे गुलाब की सूरत सजा लिया
पैबंद जो हमारी क़बा में लगा रहा

जब तक वो सबके हक़ के लिए फ़िक्रमंद था
“मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”

चींटी से लेके चांद-सितारों के ग़ोल तक
हर एक उसकी की हम्दो-सना में लगा रहा

शुहरत हुई ये जबसे कि हम हैं वफ़ापरस्त
जो भी लगा रहा वो जफ़ा में लगा रहा

तू है हमारे पास इस अहसास के लिए
ख़ुश्बू का तेरी इत्र हवा में लगा रहा

नाज़िम नक़वी 9811400468

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

19 comments on “T-25/4 ख़ुदबीं था हुस्न अपनी अदा में लगा रहा-नाज़िम नक़वी

  1. waaaaaaaah, bahot khoob

  2. Nazim sahab,

    हमने उसे गुलाब की सूरत सजा लिया
    पैबंद जो हमारी क़बा में लगा रहा
    Bohot hi badhiya sher aur gazal! Daad kubul farmaye…

  3. ख़ुदबीं था हुस्न अपनी अदा में लगा रहा
    और इश्क़ भी उसी की बक़ा में लगा रहा

    सब अपने अपने हिस्से का ग़म बांचते रहे
    और मैं था इक परी की कथा में लगा रहा

    हमने उसे गुलाब की सूरत सजा लिया
    पैबंद जो हमारी क़बा में लगा रहा

    जब तक वो सबके हक़ के लिए फ़िक्रमंद था
    “मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”

    चींटी से लेके चांद-सितारों के ग़ोल तक
    हर एक उसकी की हम्दो-सना में लगा रहा

    शुहरत हुई ये जबसे कि हम हैं वफ़ापरस्त
    जो भी लगा रहा वो जफ़ा में लगा रहा

    तू है हमारे पास इस अहसास के लिए
    ख़ुश्बू का तेरी इत्र हवा में लगा रहा
    …………………………….
    आदरणीय नाजि़म नक़वी साहब।
    मैं यह कहना चाहता हूं कि उपरोक्‍त सारे ही अश्‍आर मुझे बहुत अच्‍छे लगे। बहुत खू़ब ग़ज़ल हुई जो देर तक साथ रहेगी।
    सादर
    नवनीत

    • जनाब नवनीत साहब… आपकी दादो-तहसीन का बहुत बहुत शुक्रिया… करम बनाये रखियेगा…

  4. सब अपने अपने हिस्से का ग़म बांचते रहे
    और मैं था इक परी की कथा में लगा रहा
    हमने उसे गुलाब की सूरत सजा लिया
    पैबंद जो हमारी क़बा में लगा रहा
    वाह क्याकहने वाह
    बहुत सुंदर

  5. नक़वी साहब.. पूरी ग़ज़ल बेहद मंझी हुई… कैसा उम्दा मतला है… और परिकथा का जवाब नहीं…आख़िर शे’र भी खूब खुशबूदार है… दाद क़ुबुलें

  6. मतले से ले कर मक़ते तक एक बेहद कामयाब ग़ज़ल हुई है नाज़िम नक़वी साहब , कैसे अच्छे अच्छे शेर हुए हैं ,

    गिरह बेमिसाल है और कैसी मुश्किल ज़मीन में कैसा नायाब मतला कहा है आपने , वाह वाह वाह ….

    बहुत बहुत बधाई….ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा आ गया !!!

    • मोह्ब्बतों का और हौसलाअफज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया दिनेश साहब…

  7. Matla ta maqta umda Ghazal, Girah bhi khoob, Nazim Naqvi sahab dher saari Mubaarakbaad qabool kare’n.

  8. ख़ुदबीं था हुस्न अपनी अदा में लगा रहा
    और इश्क़ भी उसी की बक़ा में लगा रहा
    शाइरी का एक पूरा युग इस ख़्याल की पैरवी , परस्तिश और बक़ा के इंतज़ाम मे सत्ताइश गर रहा है लेकिन वो दौर 50 बरस पीछे छूट चुका है !! आज जदीदियत के इस दौर में रिवाइत की खुश्बू ऐसी लगती है जैसे कम्प्यूटर के स्पेक्ट्रम को किसी रंगे हिना ने छू लिया हो या डिओड्रेंट के मुकाबिल कोई ताज़ा गुलाब खडा हो !! दिलचस्प ये भी है कि अदा -बक़ा के काफिये बेशतर मतलों मे शुमार हैं !! लेकिन अस्ल बात तो मैं भूला जा रहा हूँ वो ये है कि – नक़वी साहब आप को इस मतले पर भरपूर दाद !!
    सब अपने अपने हिस्से का ग़म बांचते रहे
    और मैं था इक परी की कथा में लगा रहा
    Attention is the greatest supplement for human EGO . इसलिये जो अपने हिस्से का गम बाँच रहे हैं वो ज़माने को अपने साथ गमगुज़ार बनाना चाहते हैं –लेकिन इक परी की कथा बाँचने वाला मासूम है !! और ये ही फर्क़ शेर बखूबी इज़हार कर रहा है !! वाह !!

    हमने उसे गुलाब की सूरत सजा लिया
    पैबंद जो हमारी क़बा में लगा रहा
    इस शेर पर दाद दाद दाद दाद !!!! वाह वाह क्या खूब कहा है !! बकौल बशीर बद्र — सर से चादर बदन से क़बा ले गई
    ज़िन्दगी हम फकीरों से क्या ले गई !! –बशीर बद्र
    फकीरों के पास क़बा के सिवा और क्या !! ?? लेकिन नक़वी साहब ने इस ख़याल की ज़ीनत में इज़ाफा किया है और इनकी क़बा में एक पैबन्द और लगा है !! मंज़र चाहे जो हो ऐसे शेर शाइरी के सरमाये मे इज़ाफा करते हैन !! इस शेर पर बार बार दाद !!
    जब तक वो सबके हक़ के लिए फ़िक्रमंद था
    “मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”
    इस ग़िरह पर विशेष दाद !! सोच ये ज़ाविया इंसानियत की नुमाइन्दगी करता है !!!
    चींटी से लेके चांद-सितारों के ग़ोल तक
    हर एक उसकी की हम्दो-सना में लगा रहा
    बेशक !! – ये नात का शेर भी हो स्कता है
    शुहरत हुई ये जबसे कि हम हैं वफ़ापरस्त
    जो भी लगा रहा वो जफ़ा में लगा रहा!!
    वफ़ा –दोस्ती – ख़ुलूस – और इंसानियत –इन सबका मर्म आप तो सम्झते हैं क्योंकि आप शाइर है –ये आपकी सिरिश्त की सरहते हैं आप मर्कज़ हैं तो ये ही आपके दाय्रे हैन लेकिन –ज़माना !!!!?? उसको क्या मालूम कि इन अल्फाज़ के म आनी क्या होते हैं !!!
    क्या तुझको पता क्या तुझको ख़बर दिन रात ख़्यालों मे अपने
    ऐ काकुले गेती हम तुझको किस तरह संवारा करते हैं
    ऐ मौजे बला , उनको भी ज़रा दो चार थपेडे हल्के से
    कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफाँ का नज़ारा करते हैं –ज़ज़्बी
    तू है हमारे पास इस अहसास के लिए
    ख़ुश्बू का तेरी इत्र हवा में लगा रहा
    तुम मेरे पास होते हो गोया
    जब कोई दूसरा नहीं होता –मोमिन

    नाज़िम नक़वी साहब !! नश्स्त का मेयार अरूज़ पर लाने के लिये बहुत बहुत मुबारकबाद !! मैं भी एक हफ्ते के लिये दौरे पर जा रहा हूँ इसलिये ये ग़ज़ल वक्त रहते मेरी किस्मत से पोर्टल पर आ गई !! –मयंक

    • तहे दिल से शुक्रिया मयंक साहब… आप किसी जौहरी की तरह ग़ज़ल के अशआर को उलटते पलटते है…
      तुफैल साहब की इस अद्बी मुहिम को ऐसे ही जौहरी की ज़रूरत भी है.जो उनके अदबी तलिबेइल्मों को उनके इल्म में इज़ाफा करवाए…
      शुक्रिया भाइ

  9. bahut achi gazal hui naqvi sahab
    Dili daad qubul kijiye
    REgards

  10. नक़वी साहब
    एक और नग़ीना ग़ज़ल। बहुत ख़ूब।
    ढेरों मुबारकबाद क़ुबूल कीजिये।
    सादर
    पूजा

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: