32 टिप्पणियाँ

T-25/2 देता रहा चकोर सदायें तमाम रात ……..मयंक अवस्थी

नादाँ था दिल कि अहदे-वफा में लगा रहा
वो उससे बेनियाज़ अदा में लगा रहा *

मुल्जिम कोई न था मेरे जलते मकान का
इस हाद्से का दाग़ हवा में लगा रहा

चुनने थे आसमाँ को सितारे सो चुन लिये
धरती का इश्तिहार खला में लगा रहा

उसके छुपाये छुप न सके दाग़ चाँद के
ये दाग़ चाँदनी की रिदा में लगा रहा

था ज़िन्दगी में मौत का ख़टका,कि यूँ कहें
इक हुक़्मे-रुख़्सती भी सज़ा में लगा रहा

पंडित के पास वेद, लिये मौलवी कुरान
कीडा भी इक ज़रूर दवा में लगा रहा

देता रहा चकोर सदायें तमाम रात
“मैं उसके साथ साथ दुआ मे लगा रहा”

ठहरा था कोई अश्क तिरी आँख में”मयंक”
या हर्फ़ खामुशी की सदा में लगा रहा

मयंक अवस्थी (8765213905&7897716173)
*( ये मिसरा तुफैल साहब के मिसरे से उठाया है)

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32 comments on “T-25/2 देता रहा चकोर सदायें तमाम रात ……..मयंक अवस्थी

  1. TAHSEEN O DAAD KE LIYE ALFAAZ KI KAM MAYEGI KA SHIKAAR HO GAYA HUn AAP KI HASEEN GHAZAL PADH KAR…
    KIS QAREENE SE
    KIS SALEEQE SE
    KIS ANDAAZ SE
    FIKRI PARWAAZ SE
    AAP NE AIK AIK SHER KI TASHKEEL KI HAI
    MAANI KHEZ…
    MAZMOON AAFRINI SE PUR
    MAANI AAFRINI SE PUR
    BHARPOOR GHAZAL KAHI HAI
    WAHH WAHHH

  2. Mayank ji, bohot hi achcha kalaam hua hai! Matla ta makta har sher khoob hai.

  3. मुल्जिम कोई न था मेरे जलते मकान का
    इस हाद्से का दाग़ हवा में लगा रहा

    मयंक भाई..
    क्या कहने !
    कमाल की ग़ज़ल.

  4. मुल्जिम कोई न था मेरे जलते मकान का
    इस हाद्से का दाग़ हवा में लगा रहा
    भैया अद्भुत शेर हुआ है…. वाह वाह…ज़िंदाबाद

  5. Itni mushkil zameen me’n kya behatreen ghazal kahi hai bhaiya..
    मुल्जिम कोई न था मेरे जलते मकान का
    इस हाद्से का दाग़ हवा में लगा रहा
    waah waah waah..sadar

  6. Mayank sahab sab se pahle to is tarah ki doosri umda Ghazal k liye mubaarak baad. Aap ki ghazal par Naazim Naqvi sahab ke ta’assuraat par swaad.
    Aap ki ghazal ka pahla misra itna jaandaar hai k mat poochhye. “NAADAA’N THA DIL ki AHDE WAFA ME’N LAGA RAHA” ye mera apna zaati khayaL hai k is tarah par ab shayad hi itna barjasta aur salees MISRA koi de payega. Jis tarah ” Mahfil e simaa ” men koi ek misra dil ko chhoo jaata hai aur saame wajd men aa jaata hai. Usi tarah Kal jab se aap ki ghazal padhi hai ye misra dil me’ ghar kargaya hai kya baat hai janaab “NAADAA’N THA DIL KI AHDE WAFA ME’N LAGA RAHA” WAAH WAAH SAINKDO’N MUBAARAKBAAD

  7. प्रणाम मयंक जी

    इस बार की तरही की ओपनिंग जोड़ी में लफ्ज़ के सचिन और गांगुली आये हैं.. इस बार का मिसरा जो गंभीरता मांगता है, उस के लिए ऐसी ही शुरुआत की ज़रूरत थी। सटीक शुरुआत हुई है।

    बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है। आपके शेरोँ में से चुनना, या उन के बारे में टिप्पणी करना मेरे बस से बाहर है. बस वाह वाह वाह। हर शेर कमाल है।

  8. ak sakht zamiin me bharpoor ..purasar gazal …
    yun to puri ki puri gazal umda hai par ye do sher khaas taur pe pasand aaye..

    मुल्जिम कोई न था मेरे जलते मकान का
    इस हाद्से का दाग़ हवा में लगा रहा

    ठहरा था कोई अश्क तिरी आँख में”मयंक”
    या हर्फ़ खामुशी की सदा में लगा रहा…kya kahne bhaiya …

    waahh waahhh

    dili mubarakbaad..

    pranam sahit

  9. एक के बाद एक दो दो चमत्कारिक ग़ज़लें , इस बार के मुशायरे का मयार बहुत ऊंचा कर दिया है आपने, बहुत शुक्रिया ऐसी ग़ज़लें ज़हन खोल देतीँ हैं

  10. मुल्जिम कोई न था मेरे जलते मकान का
    इस हाद्से का दाग़ हवा में लगा रहा

    मयंक साहब हवा क़ाफिया इससे बेहतर इस्तेमाल शायद हो पाए… और वो भी दाग़ के साथ…
    आपने और तुफैल साहब दोनों ने नायाब अशआर से इस ज़मीन को जिला बख्शी… मुबारकबाद…

  11. मुल्जिम कोई न था मेरे जलते मकान का
    इस हाद्से का दाग़ हवा में लगा रहा

    चुनने थे आसमाँ को सितारे सो चुन लिये
    धरती का इश्तिहार खला में लगा रहा
    Bahut achi gazal hai dada
    dada dili daad hazir hai
    Sadar
    IMran

  12. नादाँ था दिल कि अहदे-वफा में लगा रहा
    वो उससे बेनियाज़ अदा में लगा रहा *

    वाह…वाह…आदरणीय मयंक भाई साहब। बहुत खूब। अहदे-वफ़ा में लगे रहने की कुव्‍वत शाायर के दिल में न होगी तो कहां होगी। सवाल तो बेनियाज़ अदा में लगे रहने वालों का है। बहुत खूब। दादा का मिसरा और उसे उसी खूबी से आपने निभाया। इस बार की तरही नशिस्‍त कमाल है।

    मुल्जिम कोई न था मेरे जलते मकान का
    इस हाद्से का दाग़ हवा में लगा रहा

    दौर-ए-हाजि़र पर क्‍या तंज़ है हुज़ूर। लेकिन इसी शे’र को दोबारा पढ़ा तो और माअनी निकले। दिल सुलगने का भी इलज़ाम हवा पर आया। यही खूबी है अग्रजों की जिनसे वे अग्रज बनते हैं।

    चुनने थे आसमाँ को सितारे सो चुन लिये
    धरती का इश्तिहार खला में लगा रहा

    अधिक क्‍या कहा जाए….बस ये शे’र मुझे दे दीजिए भैया।

    उसके छुपाये छुप न सके दाग़ चाँद के
    ये दाग़ चाँदनी की रिदा में लगा रहा
    आह….आह…..मैं सर खपाता रहा लेकिन चांदनी की रिदा के दाग़ की तरफ़ खयाल ही नहीं गया। बहुत उम्‍दा। उम्‍दा। आह…।

    था ज़िन्दगी में मौत का ख़टका,कि यूँ कहें
    इक हुक़्मे-रुख़्सती भी सज़ा में लगा रहा

    देता रहा चकोर सदायें तमाम रात
    “मैं उसके साथ साथ दुआ मे लगा रहा”

    ठहरा था कोई अश्क तिरी आँख में”मयंक”
    या हर्फ़ खामुशी की सदा में लगा रहा

    आपको नमन। बहुत खूब। आभार। शुक्रिया।
    सादर
    नवनीत

    • नवनीत भाई !! अधिक क्या कहूँ –जिस शय की हम सब्को तलाश है वो जब मिल जाती है तो जो सुकून हमको मिलता है ,जो शांति हमको मिलती है और जो अश्क उस वक़्त आँखों मे उमड आते हैं वो ही ज़िन्दगी का हासिल होते हैं !! अब ये इन लम्हों में आपका तब्सरा पढने के बाद मैं महसूस कर रहा हूँ और पहले भी आपके बयान मुझे ऐसा ही महसूस करवाते रहे हैं –मुझे यकीनन लगता है कि मुझे कोई अपना मिल गया है –इतनी मुहब्बत और कहाँ मिलती है !! मेरे जैसा नान प्रोफेशनल वयक्ति हमेशा इसी शय “मुहब्बत” की तलाश मे शाइरी की दुनिया में भी यायावरी करता रहता है लेकिन मालिक मेहरबान है जुस्तजू रायगाँ नहीं गई !! मुझे आपसे जो प्रेम और स्वीकृति मिलती है वो अनिर्वचनीय है !!
      आपकी ज़िन्दगी सुकून,उत्साह , उमंग , त्वरा और संचेतना से हमेशा आपूरित रहे !! यही कामना आपका ये भाई आपके लिये कर रहा है !! –सस्नेह –मयंक

  13. मयंक जी क्या ही खूब ग़ज़ल हुई है।वाह वाह वाह
    इस बार का क़माल ये है की शुरुआत ही उस्तादों से हुई है।
    न केवल बेहतरीन पढ़ने को मिल रहा है बल्कि इसी ज़मीन पर कुछ बेहतर कहने का हौसला भी मिल रहा है।
    ढेर सारी दाद के साथ शुक्रिया।
    सादर
    पूजा

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