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T-25/1 ज़ख़्मी था मैं सो आहो-बुका में लगा रहा-तुफ़ैल चतुर्वेदी

ज़ख़्मी था मैं सो आहो-बुका में लगा रहा
वो सबसे बेनियाज़ अदा में लगा रहा

पलकों पे इक ज़रा सी नमी क्या दिखाई दी
आलम तमाम उसकी दवा में लगा रहा

उसकी गली तो इतनी न तारीको-तार थी
फिर भी हरिक चराग़ हवा में लगा रहा

सहरा में मेरे बाग़ बदलते चले गये
शाइर था मैं ख़याली घटा में लगा रहा

उक़दा खुला कि दुश्मने-जां था मिरा वो, मैं
ताउम्र जिसकी हम्दो-सना में लगा रहा

वो चाहता था जान से जाऊं किसी तरह
“मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”

तुफ़ैल चतुर्वेदी                                 09711296239

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25 comments on “T-25/1 ज़ख़्मी था मैं सो आहो-बुका में लगा रहा-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. sanglaakh zameen meN kya kya gul boote aap ne khilaye haiN…wahhh
    aur girah to zehn men girah ki baith gayi…
    kya kya sher kahe haiN
    kya kya mazaamewen liye haiN
    SUPERB

  2. Waaaaaah, bahot khoob, bahot khoob

  3. aap hi aisi ghazal kah sakte hain ,

  4. वाह वाह वाह !!!

    एक मुश्किल ज़मीन को आसान कर देने का हुनर कोई आप से सीखे.

    प्रणाम स्वीकार करें.

  5. कमाल की गजल हुई speechless सर

  6. ज़िन्दाबाद दादा.. कैसी शानदार ग़ज़ल हुई है…. वाह वाह….पूरी ग़ज़ल कमाल और गिरह का तो जवाब नहीं… ढेर सारी दाद..प्रणाम….

  7. waah waah waah..kya hi umdaa ghazal hui hai dada ..lafz nhi’n mil rahe hain kuchh kehne ke liye… dher sari daad qubul farmaye’n ….sadar pranam

  8. bahut hii khuub ghazal kahii hai aapne. bahut hii shaandaar aagaaz tarahii kaa. agar adhikkar de to aapkaa aur logon kii tarah “daadaa” kahuun.

  9. Tufail Sahab, bohot hi khoob girah lagayi hai aapney! Wah wah.. beshumaar daad kubool karein.
    Gazal bhi bohot khoob hai; mubarakbaad!

  10. मुह्तरम जनाब तुफ़ैल साहब मुश्किल ज़मीन पर बड़ी आसानी से ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने, दाद ओ मुबारक़बाद कुबूल फरमायें

  11. प्रणाम दादा
    बेहतरीन ग़ज़ल कहने के लिए शुक्रिया। क्या ही अच्छे अच्छे शेर निकाले हैं आपने। बहुत ही ख़ूब।
    ढेर सारी दाद तालियों की गड़गड़ाहट के साथ।
    इसे पढ़ कर सीखने को मिल रहा है की किस तरह उम्दा ख़्यालों और लफ़्ज़ों के साथ बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही जा सकती है।
    शुक्रिया दादा
    सादर
    पूजा

  12. सर प्रणाम,

    इससे बेहतर आगा़ज़ की मैने कल्पना भी नहीं की थी

    ज़ख़्मी था मैं सो आहो-बुका में लगा रहा
    वो सबसे बेनियाज़ अदा में लगा रहा

    वाह वाह वाह, इस ज़मीन में ऎसा मतला शायद दुबारा न कहा जा सकेगा

    पलकों पे इक ज़रा सी नमी क्या दिखाई दी
    आलम तमाम उसकी दवा में लगा रहा

    जि़ंदाबाद, मेरे लिए तो मुशायरा यहीं मुकम्मल हो गया

    उसकी गली तो इतनी न तारीको-तार थी
    फिर भी हरिक चराग़ हवा में लगा रहा

    हरिक चराग़ हवा में लगा रहा…..अहा
    गली तो इतनी न तारीको तार थी…..अहा अहा अहा

    सर, एक बब्बर शेरों की फ़ौज तैयार हो रही है

    सहरा में मेरे बाग़ बदलते चले गये
    शाइर था मैं ख़याली घटा में लगा रहा

    क्या कहना, ख़याली घटा अौर सहरा में बाग़ का बदलते जाना….चमत्कारिक रब्त क़ायम हो रहा है

    उक़दा खुला कि दुश्मने-जां था मिरा वो, मैं
    ताउम्र जिसकी हम्दो-सना में लगा रहा

    दुश्मने जाँ था, hatss off…अब इस ज़मीन में और क्या कहा जाए……????

    वो चाहता था जान से जाऊं किसी तरह
    “मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”

    और इन सबके बाद….ये सबसा बड़ा शेर घात लगाए बैठा है

    दादा जी भर गया….कुछ दिनों की गिज़ा मिल गई शायरी को…अब कुछ दिन शेर ठीकठाक होंगे

  13. T-25 ka shaandaar aaghaaz, “BEHTAREEN GHAZAL” mubaarakbaad Tufail sahab

  14. Dada pranam…

    Dada kya hi umda gazal hui hai…ahaa ahaa
    Mushayre ki zabardast shurauaat…,Mayank bhaiya ke comment ke baad kahne ko kuch bacha hi nahin…

    ज़ख़्मी था मैं सो आहो-बुका में लगा रहा
    वो सबसे बेनियाज़ अदा में लगा रहा

    पलकों पे इक ज़रा सी नमी क्या दिखाई दी
    आलम तमाम उसकी दवा में लगा रहा

    उसकी गली तो इतनी न तारीको-तार थी
    फिर भी हरिक चराग़ हवा में लगा रहा

    सहरा में मेरे बाग़ बदलते चले गये
    शाइर था मैं ख़याली घटा में लगा रहा

    उक़दा खुला कि दुश्मने-जां था मिरा वो, मैं
    ताउम्र जिसकी हम्दो-सना में लगा रहा

    वो चाहता था जान से जाऊं किसी तरह
    “मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”

    Haay….kya kahne zindabad

    Most inspiring for us …

    with regards

  15. आदरणीय दादा,

    प्रणाम।

    सुबह से कमेंट करने का प्रयास करता रहा लेकिन दौरे पर होने के कारण मोबाइल का नेटवर्क साथ छोड़ता रहा। भरपूर ग़ज़ल……. और यह बताती हुई कि सख्‍़त ज़मीन में भी फूल खिलाना उस्‍तादों का ही काम है। बहुत अच्‍छी ग़ज़ल और हर शे’र अपने आप में उपन्‍यास का विस्‍तार लिए हुए। ये शे’र व्‍यक्तिगत रूप में मेरे बहुत नजदीक लगा दादा :

    पलकों पे इक ज़रा सी नमी क्या दिखाई दी
    आलम तमाम उसकी दवा में लगा रहा

    इसके कई शेड्स हैं जो हर बार अलग तरह से खुलते हैं।
    हालांकि मुशायरा अब तक़रीबन हो ही गया है फिर भी आने वाली ग़ज़लों का इंतज़ार रहेगा।
    सादर
    नवनीत

  16. अप्रतिम और विलक्षण !!! इस ज़मीन पर इस गज़ल के लिये यही जुमला सबसे सटीक और सबसे मुफीद है क्योंकि ये ज़मीन कबीर की तंग गली जैसी है जिसमें तरही मिसरे की ज़मीन और शाइर की इख़्तियारी खामा ख्याली दोऊ नहीं समा सकते !! ज़मीन बेशक ज़रख़ेज है लेकिन इसमे फस्ल उगाने के लिये जितना हल दिलो जेहन पर चलाना लाज़मी है वो कम स कम मेरे जैसों के बूते के बाहर की बात है –इसलिये मुशायरे की इस गज़ल को दर अस्ल सबसे आखीर में पोस्ट होना चाहिये था !!! जिस अधिकार और उस्तादी से इस ज़मीन पर ये शेर कहे गये हैं उससे एक बात बहुत बहुत खुशी की ये भी है कि –दादा आज भी वही 22 बरस की उम्र वाले तुफैल हैं और तनकीदों की बारिशें – और बेशुमार सम्पादन ने भी उनके शाइर को पस्मंज़र में नहीं धकेला है वरन आज वो और ज़ियादा भव्य , आसान और गहराई वाला बयान दे रहे हैं !! इस गज़ल पर इसीलिये विशेष रूप से मुबारकबाद !!!

    ज़ख़्मी था मैं सो आहो-बुका में लगा रहा
    वो सबसे बेनियाज़ अदा में लगा रहा

    इस हादसे की नख़्वते साकी को क्या ख़बर
    बादा पिया कि ज़हर पिया तश्नाकाम ने –शिकेब

    जैसा इफेक्ट है शेर मे और विप्र्लम्भ श्रंगार के सिवा दर्द भी इस शेर की आवाज़ मे शुमार है !!!!

    पलकों पे इक ज़रा सी नमी क्या दिखाई दी
    आलम तमाम उसकी दवा में लगा रहा

    सुन्दर कहा है –गो कि इस बयान का लाभार्थी कौन खुशनसीब है इसका ज़िक्र नहीं किया गया जब्कि सब्को मालूम है कि लाभार्थी और कौन हो सकता है सिवाय महबूब के !! जिसके इख्तियार की लडाई मे ज़माना अगयार की भूमिका निभाता है !!

    उसकी गली तो इतनी न तारीको-तार थी
    फिर भी हरिक चराग़ हवा में लगा रहा

    सूरज की आराधना भी चराग़ जला कर की जाय तो ऐसा शेर कहा जाता है –

    जब्कि तुझ बिन नहीं कोई मौज़ूद !!!
    फिर ये हंगामा ऐ ! खुदा!! क्या है!!? –गालिब

    सहरा में मेरे बाग़ बदलते चले गये
    शाइर था मैं ख़याली घटा में लगा रहा

    आ ही जाता है तस्व्वुर से ज़मीं पर शाइर
    आलमे ख़्वाब किताबों मे पda रहता है –मयंक

    शायर दो संसारों मे रहता है एक वो जिसमें सब रहते हैं और एक वो जिसमें सिर्फ और सिर्फ वो खुद और उसकी अना रहती है !!!

    उक़दा खुला कि दुश्मने-जां था मिरा वो, मैं
    ताउम्र जिसकी हम्दो-सना में लगा रहा

    बहुत खूबसूरत शेर है !! फिरदौसी ने अपने बादशाह के लिये भी शाहनामा मे कहीं कहीं ऐसे संकेत दिये हैं ऐसे एक दो फारसी शेरों का हवाला कहीं पढा था जो इस शेर से गुज़र कर याद आ गया !! इस सन्दर्भ मे एक शेर बशीर बद्र का भी याद आया –
    सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा
    इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा –बब

    वो चाहता था जान से जाऊं किसी तरह
    “मैं उसके साथ-साथ दुआ में लगा रहा”

    क्या गिरह है वाह !!! एक मैं हूँ जो इधर पिछले 10 रोज़ से सर मार रहा हूँ लेकिन ये ज़मीन सर होना तो दूर अपनी सरहद भी छूने नहीं दे रही !!!

    दादा !! इस गज़ल के लिये भरपूर बधाई !!! कई मिसरे माइल कर रहे हैं कि उन्हें किसी और पैरहन में बाँध कर चुरा लिया जाय !! वक़्त आने पे ये काम भी किया जायेगा !! फिलहाल आपको बाखबर कर रहा हूँ ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये !! दाद दाद दाद !!! –मयंक

  17. आगाज़ ही आपसे हुआ है गुरुदेव, इसबार शुभ ही शुभ है….

    • भुवन जी बहुत बहुत धन्यवाद। कहाँ ग़ायब रहे ? बहुत समय बाद दिखाई दिये ? अब बने रहिएगा

  18. मोह्तरम भाइ… पूरी गज़ल बहुत अच्छी हुई है… गिरह का तो जवाब नहीं… वाह…

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