10 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल:- चांदनी मुझ से भी कभी बिखरे-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

चांदनी मुझ से भी कभी बिखरे
दाग़ मुझ में हैं चाँद से गहरे

चोट करते हुए छुपा दी थी
अपनी तस्वीर घाव में तेरे

धूप की इक नदी में उतरा हूँ
ले के पलकों पे ख़्वाब के क़तरे

ये शरर ही कहानियां हैं मिरी
उड़ते हैं जो अलाव से मेरे

वरना मरकज़ नहीं मैं नुक़्ता हूँ
मुझको रहते हैं दायरे घेरे

एक रनवे पे दौड़ते हैं हम
और रोज़े-अज़ल के हैं उतरे

कब तलक मैं हरा रहूँगा भला
चार जानिब हैं काठ के चेहरे

उस के सब राज़दार डूब गए
शाम के राज़ थे बड़े गहरे

शोर करते हैं जिस्म की तह में
तेरे ख़ामोश लम्स के क़तरे

बीच रस्ते में इक सराय मिली
अश्क गालों पे आ के टुक ठहरे

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ 08879464730

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10 comments on “ग़ज़ल:- चांदनी मुझ से भी कभी बिखरे-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. स्‍वप्निल भाई।
    सच बताइए। कुछ कहने को रह जाता है क्‍या ?
    आभार। इतनी शानदार ग़ज़ल के लिए।

  2. कब तलक मैं हरा रहूँगा भला
    चार जानिब हैं काठ के चेहरे

    उस के सब राज़दार डूब गए
    शाम के राज़ थे बड़े गहरे

    शोर करते हैं जिस्म की तह में
    तेरे ख़ामोश लम्स के क़तरे
    Bahut achi gazal hui dada
    Dili daad qubul kijiye
    SAdar

  3. kya baat hai awapnil sahab kya achchi ghazal hui hai… Apni tasweer ghav mein tere… Kya baat hai

  4. वरना मरकज़ नहीं मैं नुक़्ता हूँ….
    वाह क्या कहने…..
    उम्दा ग़ज़ल
    ढेरों मुबारकबाद सर
    सादर
    पूजा

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