6 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल:- इब्तदाई दो तीन ग़ज़लें हैं-आसिफ़ अमान

इब्तदाई दो तीन ग़ज़लें हैं
वो मिरी बहतरीन ग़ज़लें हैं

पहले वो था अब उससे वाबस्ता
ज़हनो-दिल में मकीन ग़ज़लें हैं

शहर में घूम कर भी देखा कर
कैसी कैसी हसीन ग़ज़लें हैं

मीर साहब हैं जब ख़ुदा-ए -सुख़न
फिर तो शाइर का दीन ग़ज़लें हैं

खुरदुरा सा जो शख्स है, उसकी
मख़मली रेशमीन ग़ज़लें हैं

मुतमईन हूँ कि मेरे होने की
बाद मेरे अमीन ग़ज़लें हैं

उतनी ज़ेरे-क़लम कहाँ आईं
जितनी ज़ेरे-ज़मीन ग़ज़लें हैं

उसके दीदार का हैं हासिल बस
ये जो ताज़ा-तरीन ग़ज़लें हैं

हुस्न का इश्क़ जानशीं है और
इश्क़ की जानशीन ग़ज़लें हैं

पढ़ता रहता हूँ उसकी आँखें ‘अमान’
आफरीन आफरीन ग़ज़लें हैं

आसिफ़ अमान 08130599876

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6 comments on “ग़ज़ल:- इब्तदाई दो तीन ग़ज़लें हैं-आसिफ़ अमान

  1. उतनी ज़ेरे-क़लम कहाँ आईं
    जितनी ज़ेरे-ज़मीन ग़ज़लें हैं

    कैसे कह लेते हैं इतनी सादगी और आराम से आसिफ़ भाई ?
    बहुत खूब। वाह…वाह। याद रहेगी।

  2. kya kahne aasif bhai.. bahut umda…ibtidaayi do teeen ghazalen kaun si hain ye to nahi pata… par ye bhi behtareen ghazal hai.. mubarakbaad

  3. अमान साहब खूब ग़ज़ल हुई है।
    बधाई
    सादर
    पूजा

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