4 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल:- डरा रहे है ये मंज़र भी अब तो घर के मुझे-दिनेश नायडू

डरा रहे है ये मंज़र भी अब तो घर के मुझे
दिखाई ख़ाब दिए रात भर खंडर के मुझे

हरिक ग़ज़ल में मैं रोज़ाना चाँद टांकता हूँ
सितारे चूमते हैं शब ! उतर-उतर के मुझे

गँवा दी उम्र उसे नज़्म कर नहीं पाया
सलीक़े आते हैं वैसे तो हर हुनर के मुझे

इस एक शौक ने मुझको मिटा दिया यारो
बस एक बार कभी देखना था मर के मुझे

किनारे बैठ के करता हूँ नज़्म अश्कों को
नदी सुनाती है अफ़साने चश्मे तर के मुझे

मैं इक अधूरी सी तस्वीर था उदासी की
किया है उसने मुकम्मल तबाह कर के मुझे

दिनेश नायडू 09303985412

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4 comments on “ग़ज़ल:- डरा रहे है ये मंज़र भी अब तो घर के मुझे-दिनेश नायडू

  1. acchi ghazal hui hai dinesh… aur aakhiri sher to kamaal hai..zindabaad

  2. हरिक ग़ज़ल में मैं रोज़ाना चाँद टांकता हूँ
    सितारे चूमते हैं शब ! उतर-उतर के मुझे

    इस एक शौक ने मुझको मिटा दिया यारो
    बस एक बार कभी देखना था मर के मुझे

    किनारे बैठ के करता हूँ नज़्म अश्कों को
    नदी सुनाती है अफ़साने चश्मे तर के मुझे

    मैं इक अधूरी सी तस्वीर था उदासी की
    किया है उसने मुकम्मल तबाह कर के मुझे

    Bhai maansoon ke sath aapki gazalon ka sailab ….
    Lutf doona ho gaya hai mausam ka…

    dheron duaaye.n

  3. वाह्ह बहुत खूबसूरत…

  4. Waah waah… kya khoob ashaar tanke hein chand sitaron ki tarh aapne apni gazal mein…bahut khoob.
    Dheron mubarakbaad
    Sadar
    Pooja

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