2 टिप्पणियाँ

राम जी का राज था और खूब उजाले थे हुज़ूर-नवीन सी चतुर्वेदी

राम जी का राज था और खूब उजाले थे हुज़ूर
उस समय भी हम मुक़द्दर के हवाले थे हुज़ूर

उन मकानों में कभी क़िल्लत ठहर पाई नहीं
हर तरफ़ दीवार में दो-चार आले थे हुज़ूर

अह्मकाना हरकतों की चोट से घायल हैं हम
क्यों न हों? चुन-चुन के हम ने नाग पाले थे हुज़ूर

बात कानों में घुसीं और लोग बाग़ी हो गये
चाबियों के सामने मज़बूर ताले थे हुज़ूर

हो न हो इस वासते पगड़ी ज़मीं पर गिर पड़ी
काँपते हाथों में मदिरा के पियाले थे हुज़ूर

वो कि जो जजिया न दे पाये बहुत मज़बूर थे
अपनी ही धरती पे यूँ जीने के लाले थे हुज़ूर

अब कोई कुछ भी कहे हम को तो ये मालूम है
वो भी टाइम था यहाँ ढेरों शिवाले थे हुज़ूर

नवीन सी चतुर्वेदी 09967024593

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2 comments on “राम जी का राज था और खूब उजाले थे हुज़ूर-नवीन सी चतुर्वेदी

  1. Achhiii gazal hui hai dada…
    zuda andaaz me kahi gaii ak bharpoor gazal…

    dili daad

    regards

  2. अच्छी ग़ज़ल हुई है नवीन जी
    मुबारकबाद
    सादर
    पूजा

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