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ग़ज़ल:- दिल चुराना ये काम है तेरा-हज़रते-ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी

दिल चुराना ये काम है तेरा
ले गया है तो नाम है तेरा

है कयामत बपा के जलवे में
क़ामते-ख़ुश-ख़िराम है तेरा

जिस ने आलम किया है ज़ेरो-ज़बर
ये ते-मुश्क-फ़ाम है तेरा

दीद करने का चाहिए आँखें
हर तरफ़ जलवा आम है तेरा

किस का ये ख़ूँ किए तू आता है
दामन अफ़शाँ तमाम है तेरा

हो न हो तू हमारी मजलिस में
तज़करा सुब्हो-शाम है तेरा

तेग़े-अबरू हमें भी दे इक ज़ख़्म
सर पे आलम के दाम है तेरा

तू जो कहता है ‘मुसहफ़ी’ इधर आ
‘मुसहफ़ी क्या ग़ुलाम है तेरा

हज़रते-ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी

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